जगदलपुर। रियासत कालीन ऐतिहासिक 75 दिवसीय बस्तर दशहरा की तैयारियां अब गति पकड़ने लगी हैं। पर्व के मुख्य आकर्षण आठ पहियों वाले दुमंजिला ‘विजय रथ’ के निर्माण के लिए माचकोट के जंगलों से उच्च गुणवत्ता वाली साल की लकड़ियों की पहली खेप शनिवार को जगदलपुर पहुंच गई। लगभग 54 घनमीटर लकड़ी से तैयार होने वाला यह भव्य रथ विजयादशमी और पर्व के अंतिम दिन शहर की सड़कों पर आस्था के साथ खींचा जाएगा।
इस ऐतिहासिक रथ को पारंपरिक स्वरूप देने के लिए बेड़ा उमरगांव और झार उमरगांव के करीब 150 पारंपरिक कारीगर जल्द ही सिरहासार भवन पहुंचेंगे। ये कारीगर बिना किसी आधुनिक उपकरण के लकड़ी के प्रत्येक हिस्से का सटीक नाप लेकर पहियों, मुख्य ढांचे और ऊपरी मंजिल को तराशेंगे। बस्तर टेंपल एस्टेट कमेटी के सचिव एवं जगदलपुर तहसीलदार राहुल गुप्ता के अनुसार, बस्तर दशहरे में हर साल नए सिरे से रथ बनाने की समृद्ध परंपरा है। इस व्यवस्था के तहत बारी-बारी से एक वर्ष चार पहियों का और दूसरे वर्ष आठ पहियों का दुमंजिला रथ तैयार किया जाता है; इस वर्ष बारी आठ पहियों वाले विशाल रथ की है। कारीगरों के आते ही निर्माण कार्य विधिवत शुरू कर दिया जाएगा।
बस्तर में रथ संचालन की यह अनूठी परंपरा करीब 619 वर्षों से अनवरत चली आ रही है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, वर्ष 1408 में बस्तर के तत्कालीन राजा पुरुषोत्तम देव ने पुरी जाकर भगवान जगन्नाथ की कठिन पदयात्रा और पूजा-अर्चना की थी। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान जगन्नाथ की कृपा से उन्हें ‘रथपति’ की उपाधि और 16 पहियों वाला विशाल रथ प्राप्त हुआ था। तभी से पुरी के इस दिव्य प्रसंग की स्मृति में बस्तर दशहरा में रथ निर्माण और संचालन की परंपरा जीवंत है।
