नई दिल्ली। भारत के राजनीतिक क्षितिज पर भारतीय जनता पार्टी ने एक ऐसी इबारत लिख दी है, जिसने पिछले पांच वर्षों के समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। 2026 के विधानसभा चुनावों के ताजा नतीजों ने न केवल पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा के अकेले दम पर राजतिलक का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि पुदुचेरी में भी सत्ता की भागीदारी सुनिश्चित कर दी। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में आजादी के बाद पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री होना भारतीय राजनीति के एक नए युग की शुरुआत का संकेत है। यदि हम 2021 से 2026 तक के सफर पर नजर डालें, तो सत्ता के इस शिखर तक पहुँचने की कहानी बेहद दिलचस्प रही है।
साल 2021 में भाजपा का प्रभाव 12 राज्यों तक सीमित था जहाँ उनके अपने मुख्यमंत्री थे, जबकि 6 राज्यों में वे सहयोगियों के सहारे थे। उस समय कांग्रेस 3 राज्यों में स्वतंत्र रूप से और 3 में गठबंधन के साथ संघर्ष कर रही थी। इसके बाद 2022 में भाजपा के आंकड़ों में मामूली गिरावट आई और मुख्यमंत्री की संख्या 11 रह गई, लेकिन पार्टी ने अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी। 2023 और 2024 के दौरान भाजपा ने अपनी रणनीति बदली और हिंदी पट्टी में जबरदस्त वापसी करते हुए अपने मुख्यमंत्रियों की संख्या को 14 तक पहुँचा दिया। इस दौरान कांग्रेस के अपने मुख्यमंत्री तो 3 ही रहे, लेकिन गठबंधन वाली सरकारों में उसकी हिस्सेदारी घटकर महज 2 राज्यों तक सिमट गई।
2025 में स्थिरता के दौर के बाद 2026 का साल भाजपा के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित हुआ। आज भाजपा बंगाल समेत देश के 17 राज्यों में सत्ता के शीर्ष पर विराजमान है और 5 अन्य राज्यों में गठबंधन सरकार का हिस्सा है। इसके विपरीत, कांग्रेस की स्थिति अब 4 राज्यों में मुख्यमंत्री और केवल 1 राज्य में साझेदारी तक सीमित रह गई है। यह आंकड़े गवाह हैं कि भाजपा ने न केवल हिंदी पट्टी बल्कि पूर्वी भारत में भी अपनी जड़ों को अभूतपूर्व मजबूती दी है। हालांकि दक्षिण भारत अब भी भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, लेकिन 2021 से 2026 तक का यह सफर साफ तौर पर दर्शाता है कि देश की सियासी तस्वीर अब पूरी तरह बदल चुकी है।
