बलरामपुर। जंगलों में हथियारों की खनक, खौफ का साया और संगठन की कमान! यह कभी बलरामपुर के ग्राम गम्हरिया निवासी सीताराम सोनवानी की पहचान हुआ करती थी। उत्तर छत्तीसगढ़ में नक्सली संगठन के एरिया कमांडर के रूप में खौफ का पर्याय रहा वही सीताराम आज बंदूक छोड़कर अपने परिवार के साथ एक शांत और सामान्य जीवन जी रहा है। हिंसा के अंधेरे से मुख्यधारा के उजाले तक का उसका यह सफर गरीबी, भटकाव, संघर्ष और अंततः जीवनसंगिनी के अटूट विश्वास की एक मिसाल है।
नब्बे के दशक में इलाके में पसरी बेबसी, गरीबी और बेरोजगारी ने सीताराम को भटकाव की ओर धकेल दिया था। परिवार के तंग हालात बदलने की आस में उसने वर्ष 1998 में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) का दामन थाम लिया। संगठन में उसका कद बढ़ा और भाकपा (माओवादी) में विलय के बाद उसे उत्तर छत्तीसगढ़ का एरिया कमांडर बना दिया गया। वर्ष 2003 में मरमा चौकी के पास हुई भीषण मुठभेड़, जिसमें तत्कालीन एसपी एसआरपी कल्लूरी घायल हुए थे, और 2004 की गोवर्धनपुर मुठभेड़ जैसी कई वारदातों में उसकी सक्रिय भागीदारी रही।
मगर हिंसा के इस रास्ते पर सीताराम का मन ज्यादा दिन टिक न सका। वर्ष 2005 में अपनी पत्नी विराजो की सलाह पर उसने हिंसा को हमेशा के लिए अलविदा कहने का फैसला किया। पहचान छिपाकर दोनों असम के जोरहाट पहुंचे, जहां सीताराम ने करीब 16 वर्षों तक हाड़-तोड़ मजदूरी कर परिवार का पेट पाला। इसी दौरान कोरोना काल में जब अखबारों से छत्तीसगढ़ शासन की पुनर्वास नीति की जानकारी मिली, तो पत्नी की निरंतर प्रेरणा से उसने मुख्यधारा में लौटने की ठान ली। 26 फरवरी 2021 को सीताराम ने तत्कालीन एसपी रामकृष्ण साहू के समक्ष औपचारिक रूप से हथियार डाल दिए।
जेल की सजा और कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद सीताराम को सरकार की पुनर्वास नीति के तहत प्रधानमंत्री आवास योजना से पक्का मकान मिला, जिसने उसके परिवार को सुरक्षित छत और सम्मानजनक पहचान दी। हाल ही में रक्षित केंद्र में आयोजित पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर जिले के एसपी वैभव बेंकर ने आत्मसमर्पण कर चुके 24 पूर्व नक्सलियों के लिए स्वीकृत 3.45 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि का वितरण किया। गरीबी के चलते भटके एक युवक का समाज की मुख्यधारा में यह सम्मानजनक पुनर्वास साबित करता है कि सकारात्मक सोच, परिवार का संबल और ठोस प्रशासनिक नीतियां किसी भी भटके हुए जीवन को नई दिशा दे सकती हैं।
