प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पति की मौत के बाद पत्नी को मिली लाइफ इंश्योरेंस की रकम मृतक की संपत्ति नहीं, बल्कि लाभार्थी का निजी सामाजिक सुरक्षा लाभ है; लिहाजा बैंक उससे मृतक के कर्ज की वसूली नहीं कर सकता। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को सख्त अंतरिम निर्देश देते हुए मृतक की पत्नी के खाते से काटी गई 17,29,999 रुपये की पूरी राशि तत्काल वापस करने का आदेश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर 2026 को तय की गई है।
यह विवाद कौशांबी जिले के एक प्राथमिक विद्यालय के दिवंगत हेडमास्टर अंबेश कुमार से जुड़ा है। अंबेश ने एसबीआई से पर्सनल लोन ले रखा था, लेकिन पिछले साल जून में एक सड़क दुर्घटना में उनका आकस्मिक निधन हो गया। पति की मौत के बाद उनकी पत्नी के बैंक खाते में जीवन बीमा क्लेम के 50 लाख रुपये जमा हुए थे। हालांकि, बैंक ने मृतक के बकाया पर्सनल लोन की भरपाई के लिए पत्नी के खाते से सीधे 17.30 लाख रुपये की कटौती कर ली। पीड़िता ने बैंक की इस मनमानी को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी कि वह न तो इस लोन की सह-उधारकर्ता थीं और न ही गारंटर, ऐसे में उनके निजी खाते से वसूली पूरी तरह अवैध है।
मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने बैंक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने व्यवस्था दी कि बीमा से मिलने वाला क्लेम मृतक द्वारा छोड़ी गई वसीयत या संपत्ति (एस्टेट) का हिस्सा नहीं होता, जिसे देनदारियों के भुगतान के लिए जब्त किया जा सके। यह एक स्वतंत्र सामाजिक सुरक्षा उपाय है, जिस पर कानूनी तौर पर केवल लाभार्थी का एकाधिकार होता है। इसलिए प्रथम दृष्टया बैंक को यह अधिकार बिल्कुल नहीं है कि वह एक विधवा के जीवन निर्वाह के पैसे से उसके दिवंगत पति के अनसिक्योर्ड लोन की भरपाई करे।
बैंक ने अपने बचाव में लोन एग्रीमेंट के क्लॉज 18(iii) का हवाला दिया था, जो वित्तीय संस्थानों को कर्ज न चुकाए जाने की स्थिति में ‘सेट-ऑफ’ यानी समायोजन का अधिकार देता है। इस क्लॉज के तहत बैंक को यह छूट होती है कि वह किसी डिफॉल्टर के बचत, आरडी या एफडी खातों से बिना पूर्व सूचना पैसे काटकर लोन में एडजस्ट कर सके। हालांकि, अदालत ने माना कि एग्रीमेंट की शर्तें भले ही कितनी भी व्यापक क्यों न लिखी गई हों, वे बैंक को किसी तीसरे पक्ष या कानूनी वारिस के स्वतंत्र बीमा लाभ पर हाथ डालने का कानूनी अधिकार नहीं देतीं।
