अम्बिकापुर/पारसनाथ सिंह। सत्ता की हनक और वीआईपी कल्चर का एक और बदरंग चेहरा अम्बिकापुर-बिलासपुर नेशनल हाईवे-130 पर लहपटरा टोल प्लाजा पर देखने को मिला। मामला प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के काफिले से जुड़ा है, जहाँ गाड़ी पर महज़ एक बूम बैरियर छू जाने की कीमत टोल के एक स्थानीय कर्मचारी को थप्पड़ों और गालियों से चुकानी पड़ी। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल चुका है और अब यह सवाल सीधे कैबिनेट मंत्री की संवेदनशीलता के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
घटना दो सितंबर की रात की बताई जा रही है। जब मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े का काफिला टोल नाके से गुजर रहा था, तभी तकनीकी या मानवीय चूक के चलते टोल का बूम बैरियर मंत्री की गाड़ी पर गिर गया। गाड़ी को खरोंच आई या नहीं, यह तो जांच का विषय है, लेकिन काफिले में सवार लोगों के ‘अहंकार’ पर इतनी गहरी चोट लगी कि वे गाड़ी से उतरे और ड्यूटी पर तैनात निहत्थे स्थानीय कर्मचारी पर टूट पड़े। वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि किस तरह कानून को हाथ में लेकर कर्मचारी के साथ बदसलूकी और मारपीट की गई। जिसके बाद पीड़ित युवक ने ग्रामीणों के साथ थाने में इंसाफ की गुहार भी लगाई।
इस पूरे मामले ने तूल पकड़ा तो कांग्रेस ने भी सरकार को घेरने में देर नहीं की। कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने इसे सीधे तौर पर ‘जंगलराज’ करार देते हुए कहा कि अगर बैरियर गिर गया था तो नियमानुसार कंपनी पर कार्रवाई की जानी चाहिए थी, न कि सड़क पर गुंडागर्दी। उन्होंने सवाल उठाया कि मंत्री के सुरक्षाकर्मियों और स्टाफ को कानून हाथ में लेने का अधिकार किसने दिया?
चौतरफा घिरने के बाद मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की ओर से एक लंबी-चौड़ी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिश की गई है। मंत्री का कहना है कि वे दिनभर की व्यस्तता के बाद गाड़ी में विश्राम कर रही थीं, इसलिए उन्हें घटना की भनक तक नहीं लगी और उन्हें इसकी जानकारी अगले दिन सोशल मीडिया से मिली। मंत्री जी ने मानवीय आधार पर कर्मचारी की गलती को ‘माफ’ करते हुए चालक के इस आचरण को अशोभनीय बताया है और यह भी साफ किया कि मारपीट में उनका पीए शामिल नहीं था, बल्कि चालक था। साथ ही उन्होंने पीड़ित कर्मचारी से मिलकर उसका हालचाल जानने की इच्छा भी जताई है।
मंत्री जी की यह संवेदनशीलता अपनी जगह सराहनीय हो सकती है, लेकिन जनता के जेहन में कुछ तीखे सवाल अभी भी कौंध रहे हैं। जिस गाड़ी में कैबिनेट मंत्री सवार हों, उसके ठीक बाहर किसी कर्मचारी को पीट दिया जाए और मंत्री महोदया को इसकी भनक तक न लगे, यह बात गले उतारना थोड़ा मुश्किल है। दूसरा सवाल यह कि जिस कर्मचारी को पीटा गया, उसने गलती की थी या सिस्टम ने? यह अलग बात है, लेकिन क्या किसी जनसेवक के काफिले को यह हक मिल जाता है कि वह सड़क पर ऑन-द-स्पॉट ‘फैसला’ सुनाए? खैर, मंत्री जी अब कर्मचारी से मिलने की बात कह रही हैं, लेकिन सवाल वही है कि अगर यह वीडियो वायरल न होता, तो क्या ‘विश्राम’ में चल रही सत्ता की यह नींद कभी टूटती?
