जगदलपुर। बस्तर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वैभव के प्रतीक ‘गोंचा महापर्व’ की सदियों पुरानी परंपराओं को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। संस्कृति और परंपराओं के गहरे जानकार शिवशंकर जोशी ने बस्तर राज परिवार के वर्तमान सदस्य कमल चंद्र भंजदेव पर महापर्व की शताब्दियों पुरानी धार्मिक मर्यादाओं के उल्लंघन का सीधा आरोप लगाया है। जोशी का तर्क है कि इतिहास में पहली बार राज परिवार के किसी सदस्य ने नेत्रोत्सव पूजा विधान के दौरान साक्षात् भगवान श्रीजगन्नाथ, माता सुभद्रा और बलभद्र स्वामी के दर्शन व पूजा-अर्चना की है, जिससे बस्तर की पारंपरिक और विहित व्यवस्था पूरी तरह खंडित हो गई है।
सांस्कृतिक इतिहास के पन्नों को पलटते हुए शिवशंकर जोशी ने स्पष्ट किया कि बस्तर गोंचा महापर्व की मूल नियमावली के अनुसार, राज परिवार का कोई भी सदस्य तब तक महाप्रभु के दर्शन नहीं कर सकता, जब तक कि तीनों पवित्र विग्रहों को पूर्ण विधि-विधान के साथ रथों पर विराजमान न कर दिया जाए। बस्तर रियासत के प्रथम महाराजा से लेकर अंतिम शासक महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव तक, सभी ने इस धार्मिक मर्यादा का पूरी निष्ठा से पालन किया था। ऐतिहासिक व्यवस्था के तहत राज परिवार की ओर से केवल श्रीगोंचा पूजा की सामग्री भेजी जाती थी, जिसे रथारूढ़ प्रक्रिया पूरी होने के बाद भगवान को अर्पित किया जाता था और तत्पश्चात महाप्रसाद राजमहल भेजा जाता था।
समय के साथ आए बदलावों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि लगभग दो दशक पूर्व, 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के विशेष अनुरोध पर कमल चंद्र भंजदेव स्वयं पूजन सामग्री लेकर इस महापर्व में सम्मिलित होने लगे थे। इस नई व्यवस्था में भी वे अब तक रथारूढ़ होने के बाद ही दर्शन करने की परंपरा का निर्वहन कर रहे थे। किंतु इस वर्ष 16 जुलाई को नेत्रोत्सव अनुष्ठान के दौरान गर्भगृह में उनकी उपस्थिति और पूजा-अर्चना ने इस प्राचीन मर्यादा को तोड़ दिया है, जो कि बस्तर की लोक आस्था के विपरीत है।
परंपराविदों के अनुसार नेत्रोत्सव पूजा विधान को संपन्न कराने का एकाधिकार केवल 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के पदेन पाढ़ी एवं पानीग्राही को सौंपा गया है। इस अत्यंत गोपनीय और विशिष्ट अनुष्ठान में राज परिवार के सदस्य का सम्मिलित होना किसी भी दृष्टिकोण से शास्त्रसम्मत या परंपरा के अनुकूल नहीं माना जा सकता। परंपराओं की अक्षुण्णता की वकालत करते हुए जोशी ने मशविरा दिया कि बस्तर राज परिवार के सदस्यों को बस्तर दशहरा और गोंचा महापर्व जैसी विश्वप्रसिद्ध सांस्कृतिक धरोहरों की बारीकियों और नियमावलियों का गहन अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि बस्तर दशहरा की कुछ अन्य महत्वपूर्ण रस्मों में भी विगत वर्षों के दौरान पारंपरिक व्यवस्था से इतर हस्तक्षेप के कारण विवाद उत्पन्न होते रहे हैं, जो लोक संस्कृति के स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है।
अपने दावों को ऐतिहासिक रूप से पुख्ता करते हुए उन्होंने रियासतकाल में 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज को प्रदत्त विशेष अधिकारों से संबंधित प्राचीन ताम्रपत्रों और अंतिम महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव द्वारा लिखित प्रामाणिक पुस्तकों का साक्ष्य प्रस्तुत किया। इन दस्तावेजों का पुरजोर हवाला देते हुए उन्होंने समाज और प्रशासन से अपील की है कि राजनीतिक या सामाजिक प्रभाव के कारण बस्तर की अनूठी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक अस्मिता से कोई समझौता न किया जाए, बल्कि इन्हें अपने मूल और शुद्ध रूप में अक्षुण्ण रखा जाए।
