पारसनाथ सिंह | अम्बिकापुर
छत्तीसगढ़ में सरगुजा जिले के उदयपुर वन परिक्षेत्र के राज माडा के घने जंगलों से आई यह चीख सिर्फ एक ग्रामीण की नहीं है, जो दंतैल हाथी के जबड़े से अपनी जिंदगी छीनकर भागा है। यह हसदेव अरण्य के उस समूचे ईकोसिस्टम की कराह है, जिसे विकास के नाम पर कोयले की भट्टी में झोंकने की तैयारी मुकम्मल हो चुकी है। सुबह के वक्त जब एक ग्रामीण रोजमर्रा की तरह जंगल की ओर बढ़ा, तो उसे क्या पता था कि प्रकृति का एक विशालकाय रक्षक अपनी उजड़ती सल्तनत के गुस्से से भरा बैठा है। दंतैल हाथी ने जब अपनी पूरी ताकत से उस ग्रामीण पर धावा बोला, तो वह खुशकिस्मत था कि बीच में आई बाइक ने उसकी जान बचा ली, वरना आज हसदेव की बलिवेदी पर एक और बेगुनाह की लाश बिछ चुकी होती। हाथी ने गुस्से में उस लोहे की गाड़ी को तिनके की तरह चबा डाला, यह गुस्सा उस बाइक पर नहीं था, यह गुस्सा इंसानी लालच के खिलाफ उस बेजुबान का आक्रोश था जो चीख-चीख कर कह रहा है कि हमारे घरों को उजाड़ना बंद करो!
परोगिया और राज माडा का यह इलाका कोई आम जमीन नहीं है, यह सदियों पुराना वो जंगल है जहां हाथी और वन्यजीव सांस लेते हैं। लेकिन इस सांसों पर अब राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और अदानी के जरिए कोयला निकालने का ऐसा ग्रहण लगा है जो पूरे क्षेत्र को श्मशान बनाने पर आमादा है। अब हसदेव के सीने को चीरकर ‘केते एक्सटेंशन’ नाम का एक नया डेथ वारंट तैयार किया जा रहा है। 17.42 वर्ग किलोमीटर में फैलने वाली इस प्रस्तावित खदान का मतलब जानते हैं आप? इसका सीधा मतलब है 4 लाख से अधिक हरे-भरे पेड़ों की सामूहिक हत्या! सात लाख पेड़ों की बलि देकर जो कोयला निकलेगा, वह भले ही कुछ शहरों को रोशन कर दे, लेकिन सरगुजा की इस धरती को हमेशा के लिए अंधेरे और खूनी संघर्ष में धकेल देगा। जब ये सात लाख पेड़ कट जाएंगे, जब हाथियों और अन्य वन्यजीवों का यह आखिरी ठिकाना बारूद के ढेरों से उड़ा दिया जाएगा, तो ये बेजुबान जानवर कहां जाएंगे? वे यकीनन गांवों का रुख करेंगे, और तब जो नरसंहार होगा, उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
यह सिर्फ पर्यावरण की तबाही का मामला नहीं है, यह एक पूरी संस्कृति और आस्था की रीढ़ को तोड़ने की साजिश है। इसी केते एक्सटेंशन की जद में आ रही है ऐतिहासिक ‘राज माडा’ की गुफा। यह गुफा आदिवासियों के लिए सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि उनकी आत्मा है, उनकी आस्था का वो पवित्रतम केंद्र है जहां उनके बूढ़ादेव और पुरखे बसते हैं। कॉर्पोरेट के मुनाफे के लिए आदिवासियों के देवताओं के घर को मलबे में तब्दील करने की तैयारी है। वन्यजीवों का यह बसेरा और आदिवासियों की यह अगाध श्रद्धा क्या चंद टन कोयले से कम कीमती है? स्थानीय लोग अपनी जमीन, अपनी आस्था और अपने जंगलों को बचाने के लिए लगातार चीख रहे हैं, खदान का विरोध कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाजें दिल्ली और रायपुर के वातानुकूलित कमरों में बैठे हुक्मरानों के कानों तक नहीं पहुंच रही हैं।
आज जो ग्रामीण बाल-बाल बचा है, वह एक चेतावनी है। यह इस बात का सीधा ट्रेलर है कि अगर केते एक्सटेंशन खदान के लिए पेड़ों पर कुल्हाड़ी चली, तो आने वाले दिनों में इंसान और जंगली जानवरों का संघर्ष अपने सबसे खूनी और चरम रूप में होगा। जब जंगलों को उजाड़ दिया जाएगा, तो हाथियों का गुस्सा थमेगा नहीं, बल्कि वो हर रोज बस्तियों को रौंदेंगे। सरकार और कंपनियां याद रखें कि कोयले की कालिख से तो हाथ साफ किए जा सकते हैं, लेकिन हसदेव के जंगलों को उजाड़ने के बाद इंसानों और बेजुबानों के खून से जो इतिहास लिखा जाएगा, उसके दाग कभी नहीं धुलेंगे। इस तबाही को तुरंत रोकना होगा, वरना हसदेव की यह आग सबको भस्म कर देगी।
