अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा शासकीय एवं निजी विद्यालयों में अनिवार्य की गई दैनिक प्रार्थना गतिविधियों को लेकर राज्य में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इस आदेश के विरोध में कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ ने गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए आदेश पर पुनर्विचार करने की मांग की है। इस संबंध में प्रकोष्ठ के पदाधिकारियों ने सरगुजा कलेक्टर के माध्यम से प्रदेश के शिक्षा मंत्री के नाम एक औपचारिक ज्ञापन सौंपा है। अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ का तर्क है कि सरकार द्वारा लागू की गई नई व्यवस्था एक धर्म विशेष की आस्थाओं से प्रेरित है, जो देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
प्रकोष्ठ के अध्यक्ष रशीद अहमद अंसारी के नेतृत्व में सौंपे गए इस ज्ञापन में सरकार से तत्काल इस आदेश को वापस लेने अथवा इसमें आवश्यक संशोधन करने का आग्रह किया गया है। इस दौरान सरकार की नीतियों पर निशाना साधते हुए रशीद अंसारी ने कहा कि वर्तमान समय में प्रदेश और देश के सामने महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक और जर्जर शिक्षा व्यवस्था जैसे कई गंभीर मुद्दे हैं, जिन पर सरकार को ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि इन मूलभूत समस्याओं के समाधान की दिशा में काम करने के बजाय, स्कूलों को सांप्रदायिक राजनीति का अखाड़ा बनाने का प्रयास किया जा रहा है, जो कि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
इसी क्रम में अम्बिकापुर शहर ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह धंजल ने भी सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसकी बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक विविधता में निहित है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था के भीतर किसी एक विचारधारा को थोपने के बजाय वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। धंजल ने आगे आरोप लगाया कि केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारें आगामी चुनावी लाभ के लिए शिक्षा के भगवाकरण और तुष्टिकरण की राजनीति का सहारा ले रही हैं, जिससे छात्रों के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। कांग्रेस के इस कड़े रुख और विरोध प्रदर्शन के बाद राज्य की शैक्षणिक और राजनीतिक फिजां में इस नई प्रार्थना व्यवस्था को लेकर बहस और ज्यादा गरमा गई है।
