भिलाई। मधुमेह (डायबिटीज) से पीड़ित दुनिया भर के लाखों मरीजों के लिए राहत की एक बड़ी और क्रांतिकारी खबर सामने आई है। अब उन्हें खून में शुगर का स्तर नियंत्रित रखने के लिए दिन में कई-कई बार इंसुलिन के दर्दनाक इंजेक्शन लगाने की मजबूरी से मुक्ति मिल सकती है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) भिलाई के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी जादुई और बेहद ‘स्मार्ट इंसुलिन जैल’ तकनीक विकसित की है, जो मरीज के शरीर में जाते ही खुद-ब-खुद डॉक्टर की तरह काम करने लगती है। यह शोध चिकित्सा जगत में मधुमेह के इलाज की पूरी दिशा बदलने की ताकत रखता है।
आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली इंसुलिन थेरेपी में मरीजों को हर दिन समय बांधकर इंजेक्शन लेने पड़ते हैं, जिनकी प्रभावशीलता भी कुछ ही घंटों की होती है। इसके ठीक उलट, आईआईटी भिलाई द्वारा तैयार की गई यह नई प्रणाली पूरी तरह ‘ग्लूकोज-संवेदनशील’ है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब इस लिक्विड जैल को एक बार शरीर में इंजेक्ट किया जाएगा, तो यह सारा इंसुलिन एक साथ खर्च नहीं करेगा। इसके बजाय, यह शरीर के भीतर एक सुरक्षित भंडार की तरह जमा हो जाएगा और धीरे-धीरे, सिर्फ जरूरत के वक्त ही इंसुलिन को शरीर में रिलीज करेगा।
इस अत्याधुनिक तकनीक की सबसे बड़ी खूबी इसका पूरी तरह स्वचालित (ऑटोमैटिक) होना है। जैसे ही मरीज के खून में शर्करा यानी ब्लड शुगर का स्तर बढ़ता है, यह जैल तुरंत एक्टिव हो जाता है और जरूरत के मुताबिक इंसुलिन छोड़ना शुरू कर देता है। जैसे ही शुगर का स्तर घटकर सामान्य आता है, इस जैल से इंसुलिन का निकलना अपने आप बंद हो जाता है। वैज्ञानिकों द्वारा चूहों पर किए गए शुरुआती लैब परीक्षणों में इसके बेहद चौंकाने वाले और सकारात्मक परिणाम मिले हैं। परीक्षण के दौरान इस जैल ने सिर्फ एक बार की खुराक में लगातार सात दिनों तक चूहों के शुगर लेवल को पूरी तरह नियंत्रित बनाए रखा।
इस युगांतरकारी शोध को आईआईटी भिलाई के प्रोफेसर डॉ. सुचेतन पाल के कुशल मार्गदर्शन में अंजाम दिया गया है। इस पूरे प्रोजेक्ट में रूंगटा इंटरनेशनल स्किल्स यूनिवर्सिटी (आरआईएसयू) के स्कूल ऑफ फार्मेसी के प्रोफेसर डॉ. संजय गुप्ता ने भी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों के इस साझे प्रयास में यह भी पाया गया कि यह जैल इंसानी ऊतकों (टिश्यूज) के लिए पूरी तरह सुरक्षित और अनुकूल है। इसमें खुद को दोबारा व्यवस्थित करने की एक अनूठी क्षमता है, जिसकी वजह से यह लंबे समय तक शरीर के भीतर बिना किसी साइड इफेक्ट के एक्टिव रह सकता है।
वैज्ञानिक जगत में इस बड़ी कामयाबी को मधुमेह के इलाज में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। यही वजह है कि इस शोध के निष्कर्षों को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘एसीएस अप्लाइड बायोमटेरियल्स’ में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को पूरा भरोसा है कि चूहों पर सफल रहने के बाद, जब भविष्य में इसका इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल किया जाएगा, तब भी यह तकनीक उतनी ही अचूक साबित होगी। अगर ऐसा होता है, तो आने वाले समय में यह खोज न केवल करोड़ों डायबिटीज मरीजों के स्वास्थ्य प्रबंधन को बेहद आसान बना देगी, बल्कि सुई के रोज-रोज के दर्द को मिटाकर उनके जीवन स्तर में भी एक बड़ा सुधार लाएगी।
