आध्यात्म डेस्क। केरल का विश्वप्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार वजह आस्था से जुड़ी नहीं, बल्कि मंदिर में चढ़ाए गए सोने से जुड़ा गंभीर मामला है। मूर्तियों पर चढ़े सोने के आवरण के वजन में भारी कमी पाए जाने के बाद कथित चोरी के आरोप लगे हैं। केरल हाई कोर्ट के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल (SIT) इस पूरे मामले की जांच कर रही है। जांच में सामने आया है कि सिर्फ सोना ही नहीं, बल्कि गर्भगृह में मौजूद अन्य कीमती स्वर्ण कलाकृतियां भी चोरी की गईं। इस मामले में मंदिर के मुख्य पुजारी कंदरारु राजीवरु सहित कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि कुछ लोग अब भी जांच के दायरे में हैं।
इन घटनाओं के बीच एक बार फिर लोगों के मन में सवाल उठने लगे हैं। सबरीमाला मंदिर में किस भगवान की पूजा होती है, यहां पूजा-पद्धति इतनी अलग क्यों है और आखिर मंदिर के मुख्य पुजारी को ‘तंत्री’ क्यों कहा जाता है?
सबरीमाला मंदिर कहां स्थित है?
सबरीमाला मंदिर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से करीब 175 किलोमीटर दूर पश्चिमी घाट की घनी पहाड़ियों के बीच स्थित है। यह मंदिर चारों ओर से जंगलों और पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ है और अपनी कठिन यात्रा तथा विशेष धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है।
सबरीमाला में किस भगवान की होती है पूजा?
सबरीमाला मंदिर में भगवान अय्यप्पा की पूजा होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान अय्यप्पा भगवान शिव और मोहिनी (भगवान विष्णु का स्त्री अवतार) के पुत्र हैं। उन्हें अयप्पन, शास्ता और मणिकंठा जैसे नामों से भी जाना जाता है।
भगवान अय्यप्पा को धर्म, तपस्या और संयम का प्रतीक माना जाता है, और यही कारण है कि उनकी पूजा अन्य मंदिरों से अलग मानी जाती है।
भगवान अय्यप्पा की पूजा के विशेष नियम
सबरीमाला यात्रा केवल दर्शन नहीं, बल्कि एक कठिन साधना मानी जाती है। मंदिर में प्रवेश से पहले श्रद्धालुओं को 41 दिनों की कठोर तपस्या करनी होती है। इस दौरान संयमित जीवन, ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन और सांसारिक सुखों से दूरी अनिवार्य मानी जाती है।
भक्त सिर पर ‘इrumudi’ नामक पोटली लेकर मंदिर पहुंचते हैं, जिसमें भगवान अय्यप्पा के लिए नैवेद्य और पूजा सामग्री होती है। यही पोटली दर्शन की पहचान मानी जाती है।
महिलाओं के प्रवेश को लेकर क्यों रहा विवाद?
भगवान अय्यप्पा को ब्रह्मचारी देवता माना जाता है। इसी कारण लंबे समय तक 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित था।
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस परंपरा को असंवैधानिक बताते हुए हर उम्र की महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश और पूजा का अधिकार दिया। इस फैसले के बाद राज्य में व्यापक विरोध-प्रदर्शन भी हुए, लेकिन अंततः कानूनी रूप से महिलाओं के प्रवेश का मार्ग साफ हुआ।
सबरीमाला के मुख्य पुजारी को ‘तंत्री’ क्यों कहा जाता है?
सबरीमाला मंदिर में ‘तंत्री’ का पद अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। तंत्री मंदिर के सर्वोच्च धार्मिक अधिकारी होते हैं, जो सभी प्रमुख अनुष्ठानों और तांत्रिक क्रियाओं के लिए उत्तरदायी होते हैं।
परंपरागत रूप से सबरीमाला के तंत्री केरल के चेंगन्नूर स्थित थाझामोन मदोम ब्राह्मण परिवार से ही होते हैं। मंदिर के खुलने, विशेष पर्वों और शुद्धिकरण अनुष्ठानों के समय तंत्री की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है।
तंत्री की भूमिका और अधिकार
तंत्री को तंत्र और आगम शास्त्रों का गहरा ज्ञान होता है। मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करने का अधिकार केवल तंत्री को होता है। मान्यता है कि जिस तंत्री ने मूर्ति की स्थापना की होती है, वह देवता के गुरु या पितामह के समान होता है।
मंदिर में किसी भी बड़े धार्मिक निर्णय, अनुष्ठान या शुद्धिकरण प्रक्रिया के लिए तंत्री की अनुमति अंतिम मानी जाती है। यहां यह पद वंशानुगत होता है, जबकि दैनिक पूजा करने वाले ‘मेलशांति’ का चयन हर वर्ष किया जाता है।
क्या सबरीमाला एक तांत्रिक मंदिर है?
हां, सबरीमाला को एक तांत्रिक मंदिर माना जाता है। यहां पूजा-पद्धति वेदों पर नहीं, बल्कि मुख्य रूप से आगम और तंत्र शास्त्रों पर आधारित है।
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, पंडालम के शाही परिवार ने भगवान अय्यप्पा की तांत्रिक पूजा के लिए आंध्र प्रदेश से थाझामोन ब्राह्मणों को आमंत्रित किया था।
सबरीमाला में स्थापित भगवान धर्मशास्ता की पंचधातु प्रतिमा 4 जून 1951 को थाझामोन मठ के कंदरारु शंकरारु द्वारा निर्मित और स्थापित की गई थी। ‘कंदरारु’ शब्द थाझामोन तांत्रिकों के नाम के साथ प्रयुक्त होने वाली पारंपरिक उपाधि है।
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