हरिद्वार. धर्मनगरी हरिद्वार एक बार फिर सियासी और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गई है. विश्व प्रसिद्ध हर की पैड़ी पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने की मांग अब खुलकर सामने आने लगी है. शुक्रवार को शहर में उस वक्त हलचल तेज हो गई, जब गंगा घाटों पर जगह-जगह ऐसे नोटिस बोर्ड दिखाई दिए, जिन पर हर की पैड़ी में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित होने की बात लिखी थी. इन बोर्डों पर किसी संस्था का नाम तो दर्ज नहीं था, लेकिन नीचे ‘आज्ञा से म्युनिसपल एक्ट हरिद्वार’ लिखा होना कई सवाल खड़े कर गया.
गंगा सभा से जुड़े लोगों का कहना है कि हरिद्वार हिंदुओं का पवित्र तीर्थ है, जहां प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु गंगास्नान और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. आने वाले समय में कुंभ मेले के आयोजन को देखते हुए इस मांग को और जरूरी बताया जा रहा है. उनका तर्क है कि आस्था और परंपरा की रक्षा के लिए हर की पैड़ी की पवित्रता बनाए रखना अनिवार्य है. इसी कड़ी में गंगा सभा से जुड़े कुछ लोग घाटों पर सक्रिय भी नजर आए और आने-जाने वालों की पहचान तक जांचने की कोशिश करते दिखे.
हालांकि प्रशासन ने इस पूरे मामले से दूरी बनाई है. गढ़वाल मंडल के आयुक्त का कहना है कि उन्हें ऐसे किसी बोर्ड के लगाए जाने की आधिकारिक जानकारी नहीं है और फिलहाल प्रशासन स्तर पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है. इसके बावजूद घाटों पर लगे बोर्डों ने माहौल को गर्मा दिया है.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान भी चर्चा में है. उन्होंने सीधे तौर पर कोई आदेश तो नहीं दिया, लेकिन हरिद्वार को देवभूमि का प्रवेश द्वार बताते हुए मां गंगा की पवित्रता बनाए रखने की बात कही. उनके इस बयान को गंगा सभा की मांग के प्रति सहानुभूति के तौर पर देखा जा रहा है.
दूसरी ओर विपक्ष ने इस मांग का कड़ा विरोध किया है. समाजवादी पार्टी के नेता एसटी हसन ने साफ कहा कि देश का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और धर्म के आधार पर किसी को किसी सार्वजनिक स्थान पर जाने से रोकना असंवैधानिक है. उन्होंने इसे स्वीकार न करने की बात कही.
इस विवाद में बागेश्वर धाम के आचार्य धीरेंद्र शास्त्री का बयान भी सामने आया है. उन्होंने कहा कि उन्हें किसी के आने-जाने पर आपत्ति नहीं है, लेकिन जो लोग हिंदुत्व और गंगा को मां मानने की भावना का सम्मान नहीं करते, उन्हें हर की पैड़ी आने की आवश्यकता पर जरूर विचार करना चाहिए.
तीर्थ पुरोहित अंग्रेजी शासनकाल का हवाला देते हुए कहते हैं कि उस दौर में भी हर की पैड़ी पर गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित था. हालांकि, कई बुद्धिजीवी और सामाजिक लोग इस तर्क से इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है कि आज के समय में धर्म की शुचिता बनाए रखने के लिए भेदभाव नहीं, बल्कि अनुशासन जरूरी है. धार्मिक स्थलों पर रील्स बनाकर आस्था का मजाक उड़ाने या ठगी करने वाले फर्जी बाबाओं पर सख्ती होनी चाहिए, लेकिन किसी समुदाय विशेष पर पाबंदी समाधान नहीं हो सकती.
कुल मिलाकर हर की पैड़ी पर लगाए गए नोटिस बोर्डों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आस्था की रक्षा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. प्रशासन के अंतिम फैसले पर अब सभी की नजरें टिकी हैं.
