सुकमा। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ढोढरा गाँव की सोढ़ी तिरपो आज ग्रामीण इलाकों में बदलाव, साहस और आत्मनिर्भरता का एक जीवंत प्रतीक बन चुकी हैं। कभी खेत की मेड़ों पर हल-बैल के सहारे दिनभर पसीना बहाने वाली यह ग्रामीण महिला आज पूरे आत्मविश्वास के साथ आधुनिक कृषि मशीनों का संचालन कर रही हैं। सोढ़ी की यह कहानी सिर्फ खेती के तौर-तरीके बदलने की नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही अवसर, प्रशिक्षण और विश्वास मिले, तो वे विकास की एक नई और प्रगतिशील दिशा तय कर सकती हैं। एक समय ऐसा भी था जब सोढ़ी को अपने ही खेत की जुताई के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन आज वे खुद पावर टिलर चलाकर न केवल अपनी किस्मत बदल रही हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं।
पारंपरिक तौर-तरीकों से आधुनिक तकनीक तक का यह सफर सोढ़ी के लिए आसान नहीं था। एक दौर था जब हल-बैल के भरोसे खेती करना बेहद कठिन, थकाऊ और समय लेने वाला काम था। उस समय आधुनिक कृषि यंत्रों को चलाने की बात तो दूर, उन्हें छूने तक का हौसला ग्रामीण महिलाओं में नहीं होता था। इस बीच जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में संचालित ‘बिहान योजना’ सोढ़ी की जिंदगी में एक बड़ा मोड़ लेकर आई। योजना के तहत तुलसी महिला ग्राम संगठन द्वारा संचालित कस्टम हायरिंग सेंटर से उन्हें पावर टिलर चलाने का विशेष प्रशिक्षण मिला। क्लस्टर पीआरपी पूजा कोड़ी के सतत मार्गदर्शन और सोढ़ी की अटूट लगन ने उस काम को मुमकिन कर दिखाया, जिसे कभी ग्रामीण परिवेश में महिलाओं के लिए असंभव माना जाता था। आज सोढ़ी न सिर्फ पूरी दक्षता से पावर टिलर चलाती हैं, बल्कि मशीन की तकनीकी बारीकियों को समझकर उसका रखरखाव भी खुद करती हैं।
इस तकनीकी बदलाव ने सोढ़ी की खेती की रफ्तार को बढ़ा दिया है और लागत में भारी कमी आई है। वर्तमान में वे अपने 30 डिसमिल खेत में आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से मक्का और मिर्च की खेती कर रही हैं। पावर टिलर के इस्तेमाल से जो काम पहले हफ्तों में होता था, वह अब कुछ ही घंटों में सिमट जाता है। इससे समय की बचत तो हो ही रही है, साथ ही फसल की पैदावार और उसकी गुणवत्ता में भी शानदार सुधार देखने को मिला है। सबसे खास बात यह है कि सोढ़ी तिरपो की यह सफलता अब केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका लाभ पूरे गाँव को मिल रहा है।
कस्टम हायरिंग सेंटर की जिम्मेदारी संभालते हुए सोढ़ी अब आसपास के छोटे और सीमांत किसानों को भी बेहद किफायती किराए पर कृषि यंत्र उपलब्ध करा रही हैं। इससे गाँव के उन गरीब किसानों को बड़ी राहत मिली है जो महंगी मशीनें नहीं खरीद सकते थे। सोढ़ी को देखकर गाँव की अन्य महिलाओं के मन से भी मशीनों को लेकर हिचक और संकोच दूर हो गया है और वे भी कृषि की नई तकनीकों को सीखने के लिए आगे आ रही हैं। वास्तव में, बिहान योजना और सोढ़ी तिरपो का यह तालमेल महिला सशक्तिकरण और तकनीकी कृषि की एक ऐसी मिसाल बन चुका है, जो आज सुकमा ही नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ की ग्रामीण महिलाओं को अपने हाथों से अपने भविष्य की नई तस्वीर गढ़ने का हौसला दे रहा है।
