प्रेग्नेंट हैं, बचें इन 5 वायरस से

दुनियाभर में कई ऐसे गंभीर वायरस व बैक्टीरिया हैं, जो सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के लिए खास नुकसानदायक नहीं होते, पर गर्भवती महिलाओं में इनका असर मां और अजन्मे बच्चे दोनों के लिए गंभीर परिणाम ला सकता है,  बता रही हैं संचिता शर्मा

जीका वायरस
पांच में से एक व्यक्ति में इस वायरस के संपर्क में आने पर हल्का बुखार, त्वचा पर निशान, आंखों में गुलाबीपन और जोड़ों में दर्द के लक्षण देखने को मिलते हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए ये नया खतरा बनकर उभर रहा है। हालांकि इसके प्रामाणिक तथ्य नहीं है कि जीका वायरस से प्रभावित बच्चों का सिर जन्म के समय छोटा होता है या दिमाग का पूरा विकास नहीं हो पाता। पर कुछ स्थितिजन्य तथ्य इस ओर इशारा करते हैं।

वैज्ञानिकों ने ब्राजील में एक साल पहले जीका वायरस के आउटब्रेक होने के बाद पैदा हुए करीब 4000 बच्चों में माइक्रोसेफली का असर देखा। उन्होंने पाया कि इसका असर प्लेसेंटा के जरिए संक्रमित मां से बच्चे को होता है। वर्ष 2015 से पहले माइक्रोसेफली के 20 मामले हुआ करते थे। ब्राजील और कोलंबिया जैसे देशों में तो महिलाओं को इस वर्ष गर्भवती न होने की सलाह दी गई है। हालांकि पहली तिमाही में महिलाओं पर ये खतरा अधिक होता है, पर भारत समेत विभिन्न देशों में महिलाओं को प्रभावित देशों में घूमने न जाने की सलाह दी गयी है। जीका वायरस की पहचान केवल जेनेटिक टेस्टिंग के जरिए होती है। कई बार ये लक्षण विकास प्रक्रिया में स्पष्ट रूप से सामने नहीं आते। इबोला व हैपेटाइटिस सी से विपरीत जीका वायरस खून में एक सप्ताह तक ही रहता है, इसी अवधि के बीच जांच में यह सामने आ पाता है। हालांकि एक बार वायरस खत्म होने के बाद महिलाओं को किसी तरह का खतरा नहीं है, पर वहां रहने वालों में इसके संपर्क में दोबारा आने की आशंका हो सकती है।
रुबेला
जर्मन मीजल्स यानी रुबेला खांसी व छींक के जरिए तेजी से फैलता है। स्वस्थ लोगों में इसके लक्षण हल्के बुखार, सिरदर्द, जोड़ों का दर्द, खराश के तौर पर दिखते हैं, पर गर्भवती महिलाओं में यह गर्भपात व नवजात शिशु में जन्मजात कमियों का कारण बन सकता है। एमएमआर (मीजल्स, मम्प्स, रुबेला) टीके से इस संक्रमण से बचाव होता है। हालांकि ये टीका भारतीय सामान्य टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है, पर कई राज्य शासित कार्यक्रमों में इसे शामिल किया गया है। भारत में 20 से अधिक की कई महिलाओं को ये टीका नहीं लगा है। विशेषज्ञों के अनुसार गर्भधारण करने से कम से कम एक माह पहले ये टीका लगवाना बेहतर रहता है। इस वायरस में एक लिवर वायरस होता है, जिससे बच्चे को रुबेला इंफेक्शन हो सकता है, ऐसे में गर्भवती महिलाओं को यह टीका नहीं लगवाना चाहिए।

ग्रुप बी स्ट्रेप
ग्रुप बी स्ट्रेप बैक्टीरिया आमतौर पर किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाता, लेकिन गर्भवती महिला व नवजात शिशु को ये नुकसान पहुंचा सकता है। मां से यह संक्रमण नवजात शिशु को बीमार कर सकता है। 35 से 37 सप्ताह की प्रेग्नेंसी में मांओं को यह टेस्ट करा लेना चाहिए। एंटीबायोटिक के साथ इसका उपचार बच्चे को संक्रमित होने से बचा सकता है।

साइटोमेगेलोवायरस
आमतौर पर स्वस्थ व्यक्तियों में इससे नुकसान नहीं होता। यह शरीर में आजीवन असक्रिय पड़ा रह सकता है। पर नवजात शिशुओं और गर्भ में पल रहे शिशु की सुनने की क्षमता पर इसका असर हो सकता है। ये खतरा तब अधिक होता है जब गर्भावस्था के दौरान यह संक्रमण सक्रिय हो जाता है। संक्रमित बच्चा जन्म के समय  देखने मंे स्वस्थ ही लगता है, पर कुछ में बड़े होने के साथ सुनने की क्षमता पर असर देखने को मिलता है। ये थूक, पेशाब, खून व वीर्य आदि फ्लुइड से फैलता है। गर्भवती महिलाओं में यह संक्रमण यौन संबंधों के दौरान या बच्चों के खून व पेशाब से फैल सकता है।

लिस्टिरियोसिस
गर्भवती महिलाओं में इस बैक्टीरिया से प्रभावित होने की आशंका 10 प्रतिशत अधिक होती है। इससे उनमें हल्की थकावट व दर्द के लक्षण दिखायी देते हैं। गर्भपात, बच्चे का विकास न होना या समय से पहले जन्म होना या जन्म के समय बच्चे के कई तरह के संक्रमण से प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है। यह संक्रमण दूषित भोजन, गैर पाश्चुराइज्ड दूध, पनीर, कच्चे मांस व मछली से होता है। गर्भवती महिलाओं को गैर पाश्चुराइज्ड दूध, बिना पके डेयरी उत्पादों व सीफूड से बचना चाहिए। संक्रमित बच्चे के उपचार के लिए एंटीबायोटिक का सहारा लिया जाता है।