बलरामपुर..(कृष्णमोहन कुमार)..जिला कांग्रेस कमेटी में कार्यकारिणी गठन के बाद से घमासान मचा हुआ है. कांग्रेस की नवनियुक्त जिला उपाध्यक्ष, जिला महामंत्री, 03 जिला सचिव सहित 11 लोगों के इस्तीफे का ठीकरा कांग्रेस जिलाध्यक्ष हरिहर यादव.. भाजपा के सर फोड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे है. इधर भाजपा ने भी पलटवार करते हुए कांग्रेस को नसीहत दे दी है कि कांग्रेस परिवारवाद को छोड़कर जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण के साथ-साथ मौका दे, और अपना बचा खुचा कुनबा बचा ले.
बता दें कि, कांग्रेस के भीतरखाने से ही बात उठी थी कि वरिष्ठों के रहते एक युवा को बलरामपुर ब्लॉक का अध्यक्ष बनाया गया है. जिन पर पार्टी विरोधी गतिविधि में शामिल होने के आरोप है और परिवारवाद के आरोप तो लगते रहे है. दूसरी बड़ी बात यह की बूथ कैप्चरिंग के आरोपित जिलाबदर की सजा काट चुके नेता प्रशांत विश्वास को पार्टी ने जिले का उपाध्यक्ष बना दिया है. जाहिर है कांग्रेस के सच्चे और निष्ठावान नेताओं को यह बात खली होगी. जिसका नतीजा सरेआम है.
आपराधिक किस्म के नेता की ताजपोशी
साल 2020 में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जिले की कानून व्यवस्था उस समय डगमगा गई. जब सागरपुर गांव में मतदान से पहले बूथ कैप्चरिंग का मामला सामने आया था. जिसमें कांग्रेस नेता प्रशांत विश्वास का नाम प्रमुखता से आया था. पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी. प्रशांत विश्वास उर्फ छोटू बंगाली की गिरफ्तारी भी हुई. जिलाबदर का मामला भी चला और एक साल के लिए जिले से बाहर भी कर दिया गया था. अब ज़रा सोचिए ऐसे नेता की ताजपोशी हो जाए. तो आलाकमान का फरमान मानने वालों को खलेगा ही..और उसी नेता की जिले के शीर्ष पद यानी उपाध्यक्ष की कुर्सी पर ताजपोशी हो और आपराधिक किस्म का नेता निष्ठावान कार्यकर्ताओं पर हुक्म का चाबुक चलाए तो किसे पचेगा. अब वही हो भी रहा है. लोग कार्यकारणी से बिदकने से भी परहेज नहीं कर रहे है. इस्तीफों की तो झड़ी लगी पड़ी है.
सत्ता का मजा लेने वाले मलाई खाकर हुए किनारे
बता दें कि 2 मार्च को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय ने बलरामपुर कांग्रेस कार्यकारिणी का गठन किया. स्वाभाविक है कार्यकारिणी गठन में जिलाध्यक्ष के द्वारा अनुशंसा किए गए नामों पर मुहर लगी. अब भला इस्तीफे के दौर क्यों? तो इस मसले को समझना होगा. विश्वस्त सूत्र बताते है की नई कार्यकारिणी की सूची तो इस्तीफे देने का एक बहाना है. दरअसल हुआ यह की कांग्रेस कई खेमों में बटी हुई है. जिसमें एक धड़ा कांग्रेस से निष्कासित चल रहे पूर्व विधायक बृहस्पत सिंह का है. दूसरा धड़ा पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव का है..और दोनों ही खेमों के नेताओं ने इस्तीफा दिया है. उसकी भी एक वजह है और वह भी किसी से छिपी नहीं है. कुछ साल पहले अपनी सरकार होने का डंका बजाने वालों ने कांग्रेस से किनारा कर लिया है और जिनके हाथ कुछ नही लगा वे पार्टी नैय्या पार करा रहे थे. उन्हें तगड़ा झटका कार्यकारणी गठन ने दे दिया है. तो अब भला वे भी करें तो क्या करें. अंदरूनी कलह है जो खुलकर सामने आ गई है.
ऐसे में अब कांग्रेस के जिलाध्यक्ष हरिहर यादव को कुछ भी बोलने से पहले समझना होगा की चूक कहां हो गई है. लेकिन उन्हें कौन समझाए की उन्होंने कितनी बड़ी गलती कर दी. जिससे निष्ठावान कार्यकर्ता आहत हो गए. उन्हें आरोप-प्रत्यारोप से भी बचना होगा. जैसा की उन्होंने हालिया दिनों में बयान दिया था. जिसे कुर्सी के मुगालते में दिया गया बयान ही कहा जाएगा. कि उनके अध्यक्ष बनने से भाजपा सकते में है. यह सब भाजपा का षड्यंत्र है. अध्यक्ष जी ज़रा सोचिए अगर यह भाजपा का षडयंत्र होता तो शायद आपका बचा हुआ कुनबा भी नजर नही आता. क्योंकि भाजपा का अपना अलग ही जुमला है. मोदी है तो मुमकिन है. बहरहाल इस अंदरूनी कलह पर रोक कब लगेगी और चुनाव पर इसका कितना असर देखने को मिलेगा यह तो देखने वाली बात होगी.
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