जांजगीर-चांपा. जिले के एक कांग्रेसी विधायक का बार-बार प्रदेश बीजेपी कार्यालय में देखा जाना इन दिनों राजनीतिक चर्चाओं का विषय बना हुआ है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह महज़ औपचारिक मुलाक़ातें हैं या इसके पीछे कोई गहरे राजनीतिक मायने छुपे हैं? बताया जा रहा है कि उक्त विधायक की बीजेपी के बड़े नेताओं से नज़दीकियां बढ़ी हैं, जिससे सियासी गलियारों में अटकलों का बाज़ार गर्म है. कांग्रेस खेमे में जहां इस पर चुप्पी साधी जा रही है, वहीं बीजेपी में इसे सामान्य राजनीतिक संवाद बताया जा रहा है.
हालांकि, जनता और राजनीतिक जानकार इसे आने वाले समय में किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़कर देख रहे हैं। लोग चुटकी लेते हुए कह रहे हैं. “ये रिश्ता क्या कहलाता है?”अब यह सिर्फ़ औपचारिक शिष्टाचार है या राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की आहट, इसका जवाब आने वाला वक्त ही देगा.
जिले की सियासत में इन दिनों एक कांग्रेसी विधायक को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है. पार्टी के भीतर ही उनकी भूमिका और निष्ठा पर सवाल उठाए जा रहे हैं. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उनका झुकाव कांग्रेस से अधिक भारतीय जनता पार्टी की ओर देखा जाता रहा है.
बताया जाता है कि यह विधायक अक्सर अपनी ही पार्टी के संगठनात्मक फैसलों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाते रहे हैं. कई मौकों पर उनके बयान विपक्ष के सुर में सुर मिलाते नजर आए, जिससे कार्यकर्ताओं में असहजता बनी रहती है. पार्टी के भीतर भी उनके इरादों को लेकर संशय की स्थिति बनी रहती है.
राजनीति जानकारों का मानना है कि संबंधित नेता पर अवसरवाद के आरोप लगते रहे हैं. उन पर यह भी आरोप लगता रहा है कि वे राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अपने रुख में बदलाव करते हैं. विरोधी उन्हें स्वार्थ की राजनीति करने वाला नेता बताते हैं, जबकि समर्थक इसे उनकी स्वतंत्र सोच करार देते हैं.
जनता के बीच भी यह धारणा बनती जा रही है कि जिस दल में वे रहते हैं, उसी पर सार्वजनिक टिप्पणी करना नहीं चूकते है. राजनीतिकारो का कहना है कि लगातार बदलते तेवर और बयानों से उनकी विश्वसनीयता प्रभावित हुई है.
हालांकि, विधायक की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जरूर है कि यदि भविष्य में उन्होंने कोई बड़ा कदम उठाया, तो उसका सीधा असर आगामी चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है.
अब देखना यह होगा कि क्या जनता इस बार अपने वोट से कोई संदेश देती है या फिर यह सियासी उठापटक यूं ही चलती रहेगी. चुनावी मौसम नजदीक आते ही इस नेता की भूमिका साफ हो जाएगी.
