जांजगीर-चांपा। जिले के कृषि प्रधान क्षेत्र में खोला जा रहा कोल डिपो किसानों के लिए विनाश का कारण बन गया है. कोयले की उड़ती धूल ने खेतों को काले रंग में ढक दिया है, जिससे खड़ी फसलें, सब्जियां बर्बाद हो रही हैं. हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि किसानों की रोज़ी-रोटी पर सीधा संकट खड़ा हो गया है, लेकिन जिला प्रशासन अब भी खामोश बना हुआ है. अब ग्रामीण किसान इसकी शिकायत राजस्व मंत्री एवं जिले के प्रभारी मंत्री ओपी चौधरी से करेंगे.
किसानों का आरोप है कि पर्यावरण नियमों और कृषि सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर कोल डिपो को अनुमति दी गई. न तो प्रदूषण नियंत्रण के इंतजाम किए गए और न ही किसानों की सहमति ली गई. डिपो से दिन-रात उड़ रही कोयले की धूल से धान एवं सब्जियों की फसलों पर जम रही है, जिससे उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.
आपको बता दें कि, नवागढ़ ब्लॉक के कन्हाईबंद ग्राम पंचायत से अनुमति लिए मेसर्स टर्टल सर्विसेस प्रोपाइटर शशांक कुमार सिंह निवासी रामा ग्रीन सरकंडा बिलासपुर द्वारा ग्राम पंचायत कन्हाईबंद में खसरा नंबर 660 रकबा 0.717 हेक्टेयर में खनिज क्षमता 19 हजार एमटी, एवं 1 हजार एमटी अस्थाई अनुज्ञा पत्र के लिए मांग पत्र कोल भंडारण के लिए दिया गया था. उक्त भूमि में कोल भंडारण के लिए नीरज सिंह पिता सीताराम द्वारा अनापत्ति पत्र की मांग की गई थी. जिसे ग्राम पंचायत ने खारिज कर दिया गया था. बावजूद राजनीति धौंस एवं पहुंच बता कर डिपो का निर्माण कार्य शुरू कर दिया है. जबकि पूरे मामला न्यायालय में लंबित हैं. आसपास निवासरत रहवासी द्वारा कुछ बोलने से कोल डिपो संचालक द्वारा धमकी दी जाती हैं।
ग्राम वासियों ने जिला प्रशासन से शिकायत किया है कि शशांक कुमार सिंह के द्वारा ग्राम पंचायत कन्हाईबंद, जनपद पंचायत नवागढ़, जिला जांजगीर-चांपा (छ०ग०) के भूमि खसरा नंबर 660/2, 660/5, 660/6, 660/7, 660/8 रकबा 0.717 हेक्टेयर भूमि में खनिज कोयला भण्डारण के लिए अनुमति न दिया जावे.
किसान छतराम टैगोर का कहना है, “हमने सालभर मेहनत की, लेकिन कोल डिपो ने सब बर्बाद कर दिया. प्रशासन को कई बार बताया, पर कोई सुनवाई नहीं हुई. कोल डिपो के धूल से अब गांव के लोगों को सांस की बीमारी हो रहा है.”
वहीं ग्राम पंचायत कन्हाईबन्द के सरपंच विनोद कुमार गोयल ने तीखा सवाल उठाते हुए कहा,“अगर यही हाल रहा तो किसान क्या खाएगा? क्या प्रशासन को सिर्फ कोल डिपो से मिलने वाला मुनाफा दिख रहा है? ग्राम में दो बार कोल डिपो द्वारा अनुमति मांगा गया था जिसे एक स्वर से ग्राम पंचायत खारिज कर दिया है, बिना ग्राम के प्रस्ताव के कोल डिपो को खोलना नियम विरुद्ध है.”
ग्रामीणों ने यह भी बताया कि भारी ट्रकों की आवाजाही से एक्सीडेंट हो रही हैं, रास्ते खराब हो चुके हैं, कोल डिपो से पास तलाब रिहायशी घर है और सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हो रही है. बावजूद इसके अब तक न कोई जांच टीम मौके पर पहुंची और न ही डिपो संचालकों पर कोई कार्रवाई हुई. कोल डिपो के आसपास रिहायशी घर, तलाब, माइनर नहर हैं.
प्रशासन की यह उदासीनता कई सवाल खड़े कर रही है. क्या किसानों की आजीविका से ज्यादा कोल डिपो संचालकों के हित महत्वपूर्ण हैं? क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? किसानों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि कोल डिपो को जल्द बंद नहीं किया गया या कृषि भूमि से दूर स्थानांतरित नहीं किया गया, तो वे व्यापक आंदोलन करेंगे. फसल नुकसान की पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी.
भूमि के बीच कोल डिपो खोलकर जिला प्रशासन ने किसानों की आजीविका पर सीधा हमला किया है. उड़ती कोयले की धूल से खड़ी फसलें तबाह हो रही हैं, लेकिन प्रशासन आंखें मूंदे बैठा है. किसानों का आरोप है, कि बिना पर्यावरणीय स्वीकृति और नियमों की अनदेखी कर कोल डिपो को अनुमति दी गई. धूल से फसलों की पत्तियां झुलस गई हैं, उत्पादन घट रहा है और भारी ट्रकों के आवाजाही से रोड एक्सीडेंट हो रहा है. शिकायतों के बावजूद न तो निरीक्षण हुआ और न ही कोई कार्रवाई.
प्रशासन एवं स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या किसानों से ज्यादा कोल डिपो संचालकों के हित जरूरी हैं? यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो किसान आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं. फसल नुकसान की पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन पर होगी.
