जांजगीर-चांपा। अस्पताल के नाम में मल्टी स्पेशलिस्ट, कंसल्टेंट डॉक्टरों की लंबी सूची और बेहतर इलाज के दावे, लेकिन जब विशेषज्ञ डॉक्टरों की वास्तविक उपलब्धता की बात आती है तो कई सवाल खड़े हो जाते हैं। जांजगीर के कलेक्टर चौक के पास संचालित श्री मल्टी स्पेशलिस्ट बर्न एवं ट्रामा सेंटर अस्पताल की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आ रही शिकायतों ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि अस्पताल में कंसल्टेंट डॉक्टरों के नाम तो दर्ज हैं, लेकिन उनकी नियमित उपलब्धता और मरीजों के उपचार में वास्तविक भूमिका की जांच जरूरी है। यदि विशेषज्ञ डॉक्टर अस्पताल में मौजूद नहीं रहते, तो मरीजों का इलाज आखिर कौन करता है? अस्पताल के नाम और वास्तविक चिकित्सा व्यवस्था के बीच का यही अंतर अब सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आ रहा है।
कंसल्टेंट डॉक्टरों के नामों की सूची, लेकिन इलाज कौन करता है?
अस्पताल में कंसल्टेंट डॉक्टरों के नामों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। मरीजों को मल्टी स्पेशलिस्ट अस्पताल में बेहतर और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा मिलने की उम्मीद रहती है। खासकर बर्न एवं ट्रामा सेंटर जैसे नाम से संचालित अस्पताल में गंभीर रूप से घायल और जले हुए मरीजों के उपचार के लिए प्रशिक्षित चिकित्सकों की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि अस्पताल में सूचीबद्ध कंसल्टेंट डॉक्टर वास्तव में किस समय उपलब्ध रहते हैं? क्या वे नियमित रूप से मरीजों की जांच और उपचार करते हैं? क्या अस्पताल में भर्ती मरीजों के इलाज के दौरान संबंधित विशेषज्ञ चिकित्सक मौजूद रहते हैं? अथवा केवल कागजों में डॉक्टरों के नाम दर्ज कर अस्पताल का संचालन किया जा रहा है?
इन सवालों का जवाब अस्पताल के रिकॉर्ड, डॉक्टरों की उपस्थिति, मरीजों की केस शीट और उपचार संबंधी दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।
संचालक की योग्यता पर सवाल, विशेषज्ञ चिकित्सा व्यवस्था की जांच जरूरी…
अस्पताल के संचालक के होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति से जुड़ा होने की बात सामने आने के बाद अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, किसी चिकित्सक की चिकित्सा पद्धति मात्र के आधार पर अस्पताल की सेवाओं को अवैध नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह जांच का विषय जरूर है कि अस्पताल में संचालित प्रत्येक चिकित्सा सेवा के लिए आवश्यक योग्यता और पंजीकरण वाले चिकित्सक उपलब्ध हैं या नहीं।
स्वास्थ्य विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अस्पताल में बर्न, ट्रामा और अन्य विशेषज्ञ सेवाओं के नाम पर मरीजों को किस प्रकार का उपचार दिया जा रहा है। अस्पताल में उपलब्ध चिकित्सकों की योग्यता, उनकी जिम्मेदारियों और मरीजों के उपचार संबंधी रिकॉर्ड का परीक्षण किया जाना चाहिए।
सवाल हैं कि जब अस्पताल का नाम मल्टी स्पेशलिस्ट है, तो क्या वहां मरीजों को वास्तव में विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएं मिल रही हैं?
जिला अस्पताल के डॉक्टरों के निजी अस्पताल में इलाज करने की शिकायत…
इस मामले में एक और गंभीर पहलू जिला अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा निजी अस्पताल में मरीजों का उपचार किए जाने की शिकायत है। यदि सरकारी अस्पताल में पदस्थ चिकित्सक निजी अस्पताल में भी सेवाएं दे रहे हैं, तो उनकी उपस्थिति, कार्य संबंधी नियमों और निजी प्रैक्टिस की अनुमति से जुड़े प्रावधानों की जांच आवश्यक है। सीएम हेल्पलाइन में शिकायत के बाद जिला अस्पताल के डॉक्टर शाहबाज खांडा इलाज करते हैं पाए गए थे जिसको स्वास्थ्य विभाग की नोटिस जारी किया था.
स्वास्थ्य विभाग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित चिकित्सक सरकारी अस्पताल में अपनी निर्धारित ड्यूटी पूरी कर रहे हैं या नहीं। क्या उनकी निजी अस्पताल में सेवाएं देने की स्थिति नियमानुसार है? क्या सरकारी अस्पताल के मरीजों को किसी निजी संस्थान में उपचार के लिए भेजा जा रहा है? यदि ऐसा है, तो इसके पीछे की परिस्थितियों और संभावित हितों के टकराव की भी जांच होनी चाहिए।
इन आरोपों की पुष्टि संबंधित डॉक्टरों की ड्यूटी, उपस्थिति रजिस्टर, अस्पताल के उपचार रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों से की जा सकती है। शिकायतों की अनदेखी करना भी स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े करेगा।
जांच टीम पहुंचने से पहले सूचना मिलने का आरोप….
अस्पताल की शिकायतों के बीच स्वास्थ्य विभाग की जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जब जांच टीम अस्पताल पहुंचती है, तो अस्पताल संचालक को पहले से ही इसकी सूचना मिल जाने की आशंका रहती है। यदि यह आरोप सही है, तो जांच की निष्पक्षता और प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है। स्वास्थ्य विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि अस्पताल की जांच किस प्रक्रिया के तहत की जाती है। क्या जांच के दौरान केवल लाइसेंस, पंजीयन और दस्तावेजों का निरीक्षण होता है, या डॉक्टरों की वास्तविक उपस्थिति, मरीजों की केस शीट, उपचार की गुणवत्ता और बिलिंग व्यवस्था का भी परीक्षण किया जाता है?
यदि शिकायतों की जांच केवल कागजी दस्तावेजों तक सीमित रह जाती है, तो वास्तविक स्थिति सामने आने में कठिनाई हो सकती है। ऐसे में अचानक निरीक्षण, रिकॉर्ड का मिलान और मरीजों से स्वतंत्र बातचीत जांच को अधिक प्रभावी बना सकती है।
इलाज के नाम पर अनाप-शनाप बिलिंग की शिकायत
अस्पताल को लेकर मरीजों से इलाज के नाम पर मनमाने बिल वसूलने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। निजी अस्पतालों में भर्ती मरीज और उनके परिजन पहले ही बीमारी, आर्थिक दबाव और मानसिक परेशानी से जूझते हैं। ऐसे में यदि उपचार के नाम पर अनावश्यक शुल्क वसूले जाने की शिकायतें आती हैं, तो उनकी जांच गंभीरता से होनी चाहिए।
