अम्बिकापुर। निरीक्षण की नौटंकी, आश्वासनों का खोखला पिटारा और जमीन पर पूरी तरह ध्वस्त सुरक्षा तंत्र। अम्बिकापुर के गांधीनगर थाना क्षेत्र स्थित ‘प्लेस ऑफ सेफ्टी’ की यही कुल हकीकत रह गई है। कन्या परिसर रोड पर सुरक्षा के नाम पर चल रहे इस संस्थान से एक बार फिर 6 अपचारी बालक सुरक्षाकर्मियों को चकमा देकर फरार हो गए। दुस्साहस का आलम यह रहा कि बालकों ने पहले रसोइए पर खौलता हुआ गर्म खाना फेंका, फिर तैनात गार्ड को कमरे में बंधक बनाकर ताला जड़ दिया और बड़ी आसानी से बाउंड्री फांदकर निकल भागे। हालांकि घेराबंदी कर 2 अपचारियों को आनन-फानन में दोबारा दबोच लिया गया, लेकिन 4 अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। यह वारदात चीख-चीख कर गवाही दे रही है कि यहां सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे है और प्रबंधन की नाक के नीचे कानून का सरेआम तमाशा बन रहा है।
यह कोई पहली घटना नहीं है जब इस तथाकथित ‘सुरक्षित’ संस्थान की दीवारें प्रशासनिक लापरवाही के आगे बौनी साबित हुई हैं। कभी खिड़की की सलाखें काटकर तो कभी बारिश और अंधेरे की आड़ लेकर अपचारियों का भागना यहां का नियमित ढर्रा बन चुका है। जब-जब ऐसी शर्मनाक घटनाएं घटती हैं, तब-तब जिले के हुक्मरान गाड़ियों का सायरन बजाते हुए मौके पर पहुंचते हैं, फाइलों पर दस्तखत होते हैं, सख्त हिदायतों के फरमान जारी किए जाते हैं और यह दावा ठोका जाता है कि अब परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा। मगर चंद रोज बाद हकीकत फिर वही ढाक के तीन पात साबित होती है। निरीक्षण के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई जाती है और जमीन पर सुरक्षा के इंतजामात शून्य रहते हैं।
सवाल यह उठता है कि गंभीर अपराधों में संलिप्त अपचारियों को सुधारने और सुरक्षित रखने के नाम पर शासन के करोड़ों रुपये फूंकने के बाद भी आखिर यहां की निगरानी किसके भरोसे छोड़ी गई है? क्या जिम्मेदारों को किसी बड़े खौफनाक हादसे का इंतजार है, या फिर उच्चाधिकारियों के लिए यह केंद्र सिर्फ एक विजिटिंग डायरी का पन्ना बनकर रह गया है? जब खिड़की तोड़ने से लेकर रसोइए पर हमला करने तक की साजिशें बैरकों में बेखौफ पकती हैं, तब ड्यूटी पर तैनात अमला और प्रबंधन क्या गहरी नींद में सो रहा होता है? कागजी निरीक्षणों और खोखले दावों की आड़ में अपनी नाकामियां छुपाने वाले जिम्मेदारों पर अब तक ठोस कार्रवाई न होना पूरे प्रशासनिक तंत्र की मिलीभगत और बेशर्मी पर करारा तमाचा है।
