जांजगीर-चांपा। जिले में कलेक्टर जन्मेजय महोबे की सरल और शांत कार्यशैली की चर्चा के बीच अधीनस्थ अधिकारियों की कार्यप्रणाली अब प्रशासन के लिए परेशानी का सबब बनती नजर आ रही है। जिले में सामने आ रहे अलग-अलग मामलों ने डिप्टी कलेक्टर से लेकर ADM और SDM स्तर के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थिति यह है कि कुछ अधिकारियों के विवादित निर्णय और कथित लापरवाही का सीधा असर अब कलेक्टर की छवि पर पड़ता दिखाई दे रहा है।
अवैध कॉलोनियों का बढ़ता कारोबार, जिम्मेदार कौन..?
जिले में लगातार अवैध कॉलोनियों के विकसित होने और नियमों के विपरीत निर्माण किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। शहर और आसपास के क्षेत्रों में जमीनों की खरीद-बिक्री के बाद बिना आवश्यक अनुमति कॉलोनी विकसित करने के आरोप लग रहे हैं। इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों की प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आने से प्रशासनिक निगरानी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
लोगों का सवाल है कि यदि सरकारी तंत्र लगातार निगरानी कर रहा है तो अवैध कॉलोनियों का विस्तार कैसे हो रहा है? क्या कार्रवाई सिर्फ शिकायत आने के बाद होती है या प्रशासन स्वयं भी ऐसे मामलों की निगरानी करता है?
कमाई का जरिया बना सिंचाई विभाग के मकान आवंटन…
सिंचाई विभाग के शासकीय आवासों के आवंटन को लेकर विवाद ने भी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में ला खड़ा किया है। विभाग की शाखा के बाबू पर मकान आवंटन को लेकर पूर्व में कई बार लेनदेन के भी आरोप लगा है.
क्योंकि सवाल यह है कि जिला प्रशासन सिंचाई विभाग के कॉलोनीयों में बने मकान का आवंटन की जिम्मेदारी अपने पास क्यों रखा गया हैं,जबकि जिला प्रशासन के पास अपने अधिकारी, कर्मचारीओ के लिए कॉलोनी है, तब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सिंचाई विभाग में बने कॉलोनी को विभाग को क्यों नहीं सौंपा जा रहा है. मकान आवंटन के लिए सिंचाई विभाग के ही कर्मचारियों को मोटी रकम चुकानी पड़ती हैं.
आरोपों के बीच संबंधित विभागीय अधिकारी जिम्मेदारी लेने के बजाय पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं।
सवाल सीधा है! सरकारी मकान किस नियम के तहत आवंटित होते हैं , किस अधिकारी ने स्वीकृति दी जाती हैं,और पूरी प्रक्रिया की निगरानी किसकी जिम्मेदारी होती हैं ? यदि प्रक्रिया पारदर्शी है तो सिंचाई विभाग को इसकी जिम्मेदारी सौंपाने में परेशानी क्यों है?
SDM कार्यालयों में जमीन के काम के लिए भटक रहे किसान..
राजस्व मामलों में भी ग्रामीणों और किसानों की परेशानी की शिकायतें सामने आती रहती हैं। जमीन की खरीदी-बिक्री, नामांतरण, सीमांकन सहित अन्य राजस्व कार्यों को लेकर ग्रामीणों को कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ने की बातें कही जा रही हैं। आम आदमी की सबसे बड़ी अपेक्षा यही होती है कि उसका काम नियम और समय-सीमा के भीतर हो, लेकिन जब उसे बार-बार कार्यालय जाना पड़े तो व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जिले में कई अवैध रेट घाट एवं कॉल डिपो संचालित हो रहे हैं जिस पर कलेक्टर ने शराब डायवर्सन को निरस्त किया है आज के समय में संचालित हो रहे हैं आखिर जिले के एसडीएम की नजर इस पर क्यों नहीं है, यह सबसे बड़ा सवाल हैं. ग्राम पंचायत कन्हाई बंद में संचालित कोल डिपो को ग्राम पंचायत की अनुमति नहीं हैं फिर भी खनिज विभाग से उन्हें एनओसी मिल गया है यह अधिकारियों के कार्य पर सवाल खड़े कर रहा हैं.
कलेक्टर जन्मेजय महोबे को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में उनकी सरलता तथा विवादों से दूर रहकर काम करने की छवि की चर्चा है। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था केवल कलेक्टर के भरोसे नहीं चलती। उनके अधीन काम करने वाले अधिकारियों की कार्यशैली भी जिले की छवि तय करती है।
यही वजह है कि सवाल अब यह नहीं है कि कलेक्टर क्या कर रहे हैं, बल्कि यह है कि उनके अधीन काम करने वाले अधिकारी क्या कर रहे हैं? विभिन्न विभागों में कामकाज, निर्माण कार्यों और कार्रवाई को लेकर समय-समय पर लेन-देन के आरोपों की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं। लेकिन लगातार उठ रही शिकायतों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि आरोप निराधार हैं तो जांच के बाद स्थिति साफ हो जाएगी और यदि कहीं गड़बड़ी है तो जिम्मेदारी भी तय होगी।
कलेक्टर को लेना होगा सख्त रुख…
प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए अब जरूरी है कि कलेक्टर अधीनस्थ अधिकारियों की कार्यप्रणाली की समीक्षा करें। जिन अधिकारियों के खिलाफ लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, उनके मामलों की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय होनी चाहिए। क्योंकि जनता की नजर में अधिकारी अलग-अलग नहीं होते, पूरे जिला प्रशासन की पहचान एक होती है।
कलेक्टर की साफ छवि के बावजूद यदि अधीनस्थ अधिकारियों के स्तर पर लापरवाही, विवाद और शिकायतें बढ़ती रहीं, तो इसका राजनीतिक और प्रशासनिक नुकसान अंततः जिला प्रशासन के शीर्ष नेतृत्व को ही उठाना पड़ेगा।
