बिलासपुर. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में एक ऐसा ऐतिहासिक स्थल है, जहां पूजा के साथ-साथ कभी इंसाफ की भी गूंज सुनाई देती थी. मगरपारा-तालापारा क्षेत्र में स्थित ‘बजरंग पंचायत मंदिर’ केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की एक अनूठी परंपरा का प्रतीक रहा है, जहां हनुमानजी को साक्षी मानकर लोगों के विवाद सुलझाए जाते थे.
करीब सौ साल से अधिक पुरानी इस परंपरा में लोग अपने छोटे-बड़े विवाद लेकर मंदिर परिसर पहुंचते थे. यहां बैठने वाली पंचायत दोनों पक्षों की बात सुनकर निष्पक्ष निर्णय देती थी, जिसे अंतिम और सर्वमान्य माना जाता था. खास बात यह रही कि इस न्याय व्यवस्था में धर्म, जाति या वर्ग का कोई भेदभाव नहीं था. हर समुदाय के लोग समान रूप से अपनी बात रखते और फैसले को सहर्ष स्वीकार करते थे.
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत अंग्रेजी शासनकाल में हुई थी, जब प्रशासनिक सुविधाएं सीमित थीं और लोग न्याय के लिए अदालतों के बजाय इसी पंचायत पर भरोसा करते थे. खुले स्थान पर स्थापित हनुमानजी के सामने बुजुर्ग और समाज के मुखिया बैठकर विवादों का समाधान करते थे. लोगों का मानना था कि प्रभु को साक्षी मानकर दिया गया फैसला कभी गलत नहीं हो सकता.
समय के साथ न्याय व्यवस्था भले ही आधुनिक हो गई हो, लेकिन ‘बजरंग पंचायत मंदिर’ की यह विरासत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है. यह स्थान आज भी सामाजिक एकता, आपसी विश्वास और नैतिक मूल्यों की ऐसी मिसाल बना हुआ है, जो बताता है कि इंसाफ केवल कानून से ही नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक आस्था और समझ से भी कायम रह सकता है.
