आध्यात्म डेस्क। प्रदोष व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना गया है। त्रयोदशी तिथि को भगवान शिव की आराधना करने से भक्तों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और कष्टों का नाश होता है। वर्ष 2026 का पहला प्रदोष व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को, 16 जनवरी शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। शुक्रवार को पड़ने के कारण यह व्रत शुक्र प्रदोष व्रत कहलाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत, पूजा और व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख, ऐश्वर्य व समृद्धि का वरदान देते हैं।
पुराणों में वर्णित शुक्र प्रदोष व्रत की कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर में तीन घनिष्ठ मित्र रहते थे। एक ब्राह्मण, दूसरा धनिक और तीसरा राजा का पुत्र। तीनों विवाहित थे, लेकिन धनिक मित्र की पत्नी अभी मायके में ही रहती थी, क्योंकि उसका गौना नहीं हुआ था। एक दिन तीनों मित्र साथ बैठे हुए बातचीत कर रहे थे। चर्चा के दौरान ब्राह्मण मित्र ने कहा कि नारी के बिना घर सूना हो जाता है। यह बात धनिक मित्र के मन में घर कर गई और उसने तुरंत अपनी पत्नी को मायके से लाने का निश्चय कर लिया।

जब उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई, तो उन्होंने समझाया कि इस समय शुक्र अस्त हैं और यह काल दांपत्य सुख के लिए शुभ नहीं माना जाता। बावजूद इसके, धनिक पुत्र अपनी जिद पर अड़ा रहा और पत्नी को लाने निकल पड़ा। ससुराल पहुंचने पर वहां भी उसे यही समझाइश दी गई, लेकिन उसने किसी की नहीं सुनी। अंततः पत्नी को साथ लेकर वह घर की ओर रवाना हो गया।
रास्ते में एक के बाद एक विपत्तियां आने लगीं। बैलगाड़ी का पहिया टूट गया, बैल घायल हो गया और दोनों पति-पत्नी को भी चोट आई। आगे बढ़ने पर डाकुओं ने उनका सारा धन लूट लिया। किसी तरह जब वे घर पहुंचे, तो धनिक पुत्र को सांप ने डस लिया। वैद्य ने साफ कह दिया कि तीन दिन में उसकी मृत्यु निश्चित है। यह सुनकर परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
जब यह समाचार ब्राह्मण मित्र को मिला, तो वह तुरंत धनिक के घर पहुंचा। उसने कहा कि यह सारी परेशानियां शुक्र अस्त के समय किए गए गलत निर्णय का परिणाम हैं। उसने सलाह दी कि धनिक पुत्र को उसकी पत्नी सहित वापस ससुराल भेज दिया जाए और परिवार शुक्र प्रदोष व्रत रखकर भगवान शिव की आराधना करे। धनिक ने मित्र की बात मान ली। जैसे ही पुत्र ससुराल पहुंचा और श्रद्धा से शुक्र प्रदोष व्रत किया गया, वैसे ही उसके स्वास्थ्य में सुधार होने लगा और धीरे-धीरे सारे संकट दूर हो गए।
यह कथा हमें सिखाती है कि शास्त्रों में बताए गए नियमों और समय का पालन करना कितना महत्वपूर्ण है। साथ ही, सच्ची श्रद्धा से किए गए शुक्र प्रदोष व्रत और भगवान शिव की कृपा से असंभव लगने वाले कष्ट भी समाप्त हो जाते हैं।
