नई दिल्ली. पान मसाला पर सरकार ने ऐसा कर प्रहार किया है, जिससे यह उत्पाद टैक्स के मामले में सबसे ऊंची श्रेणी में पहुंच गया है. 1 फरवरी 2026 से पान मसाला के निर्माण पर स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर लागू कर दिया गया है, जो पहले से लग रहे 40 प्रतिशत जीएसटी से पूरी तरह अलग है. दोनों को मिलाकर पान मसाला पर कुल टैक्स बोझ 88 प्रतिशत हो गया है. बजट दस्तावेजों के मुताबिक, सिर्फ इसी उपकर से वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार को करीब 14,000 करोड़ रुपये की आय होने का अनुमान है, जबकि चालू वित्त वर्ष के बचे हुए दो महीनों, फरवरी और मार्च में ही 2,330 करोड़ रुपये जुटने की उम्मीद है.
यह उपकर पान मसाला बनाने वाली कंपनियों की उत्पादन क्षमता के आधार पर वसूला जाएगा, जिससे टैक्स चोरी पर भी प्रभावी अंकुश लगेगा. सरकार का मानना है कि इससे न सिर्फ राजस्व बढ़ेगा, बल्कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक उत्पादों की खपत को हतोत्साहित करने में भी मदद मिलेगी. इस सेस से मिलने वाली राशि को राज्यों के साथ साझा किया जाएगा और इसका उपयोग स्वास्थ्य जागरूकता, सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाओं और अन्य संबंधित गतिविधियों पर किया जाएगा.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पहले ही स्पष्ट कर चुकी हैं कि इस स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर का उद्देश्य देश के दो अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्रों, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक स्थायी और अनुमानित वित्तीय स्रोत तैयार करना है. दिसंबर 2025 में संसद ने पान मसाला पर इस तरह का सेस लगाने और तंबाकू पर एक्साइज ड्यूटी लगाने को मंजूरी दी थी, जिसके बाद इसे बजट प्रावधानों में शामिल किया गया.
इस फैसले की पृष्ठभूमि जीएसटी काउंसिल के सितंबर 2025 के उस निर्णय से भी जुड़ी है, जिसमें तय किया गया था कि कोरोना महामारी के दौरान राज्यों को मुआवजा देने के लिए लिए गए कर्ज के भुगतान के बाद कंपनसेशन सेस व्यवस्था को समाप्त किया जाएगा. 31 जनवरी 2026 तक 2.69 लाख करोड़ रुपये के इस कर्ज का भुगतान पूरा होने के बाद, ऐसे उत्पादों पर जीएसटी के अलावा सेस और एक्साइज ड्यूटी के नए विकल्प अपनाए जाएंगे. पान मसाला पर लगाया गया यह 88 प्रतिशत टैक्स उसी नीति का प्रत्यक्ष उदाहरण माना जा रहा है.
