नई दिल्ली. गाजियाबाद के हरीश राणा ने आखिरकार 13 साल लंबे असहनीय जीवन संघर्ष के बाद दुनिया को अलविदा कह दिया. पिछले डेढ़ दशक से कोमा में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हरीश को सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के बाद दिल्ली के एम्स में शिफ्ट किया गया था, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनकी जीवन-रक्षा प्रणाली को तय प्रक्रिया के तहत हटाया गया और उन्हें गरिमापूर्ण विदाई दी गई. इस फैसले के साथ ही हरीश को उस पीड़ा से मुक्ति मिल गई, जिसे उनका परिवार वर्षों से करीब से देख रहा था.
करीब 13 साल पहले चंडीगढ़ में अपने पीजी के चौथे फ्लोर से गिरने के बाद हरीश गहरे कोमा में चले गए थे. सिर और कमर में गंभीर चोटों के कारण उनकी हालत कभी सुधर नहीं सकी. उस वक्त वह पंजाब यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे और एक उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया. परिवार ने इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी, यहां तक कि पिता को अपना घर तक बेचना पड़ा और पूरा परिवार गाजियाबाद के एक छोटे से फ्लैट में सिमट गया, मगर हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ.
जब उम्मीदें पूरी तरह टूट गईं, तब परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. कोर्ट ने मानवीय पहलू को देखते हुए इच्छामृत्यु की अनुमति दी और एम्स को निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया संवेदनशील और व्यवस्थित तरीके से पूरी की जाए. हरीश को इच्छामृत्यु मिलने का यह मामला देश में एक मिसाल बन गया है.
एम्स ले जाने से पहले एक भावुक क्षण भी देखने को मिला, जब ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ी कोमल बहन ने हरीश का तिलक कर उन्हें शांति का संदेश दिया. “सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए सो जाओ.” यह दृश्य वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर गया.
फिलहाल हरीश राणा के अंतिम संस्कार को लेकर परिवार ने कोई निर्णय सार्वजनिक नहीं किया है. यह तय नहीं है कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में होगा या गाजियाबाद में. मूल रूप से हिमाचल प्रदेश से ताल्लुक रखने वाला यह परिवार अब एक ऐसी कहानी छोड़ गया है, जो जीवन, पीड़ा और गरिमा के अधिकार पर एक गहरी बहस छेड़ती है.
