सुकमा. बस्तर के घने जंगलों में कभी जहां बच्चों को जनताना स्कूलों के जरिए माओवादी विचारधारा का पाठ पढ़ाया जाता था, वहीं अब भारतीय संविधान और औपचारिक शिक्षा की आवाज गूंजने लगी है. बदलाव की इसी नई तस्वीर के बीच सुकमा जिले के कोंटा ब्लॉक में शिक्षा विभाग ने 22 नए स्कूल खोलने का प्रस्ताव भेजा है, जो उन बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है जिन्होंने आज तक स्कूल की दहलीज तक नहीं देखी.
बीजापुर और सुकमा के कई नक्सल प्रभावित गांव वर्षों तक मुख्यधारा से कटे रहे, जहां शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह ठप पड़ गई थी. हालात इतने गंभीर रहे कि कई गांवों में 10 साल तक के बच्चों का अब नर्सरी में दाखिला करना पड़ रहा है, क्योंकि उन्होंने कभी स्कूल देखा ही नहीं. कोंटा ब्लॉक इस संकट का सबसे बड़ा उदाहरण रहा है.
हिड़मा के गांव पूवर्ती में सीआरपीएफ द्वारा गुरुकुल शुरू किए जाने के बाद बदलाव की शुरुआत हुई. करीब दो दशक बाद यहां बच्चों को पहली बार स्कूल, ब्लैकबोर्ड और पढ़ाई की बुनियादी समझ दी गई. आज पूवर्ती गुरुकुल में 30 बच्चे अध्ययनरत हैं, जबकि शिक्षा विभाग के स्कूल में भी 20 से अधिक बच्चों ने प्रवेश लिया है. टेकलागुड़ा समेत अन्य गांवों में सुरक्षा कैंप खुलने के बाद स्कूल और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित होने लगी हैं.
यह बदलाव अब उन गांवों तक भी पहुंच रहा है, जो कभी नक्सल गतिविधियों के गढ़ माने जाते थे. मिलिट्री दलम के पूर्व कमांडर और आत्मसमर्पित नक्सली बारसा देवा के गांव ओयोपारा में अब शिक्षा की नई शुरुआत हो रही है. यहां पहले केवल जनताना स्कूल चलते थे और देवा के बेटे व भाई को छोड़कर कोई भी बच्चा स्कूल नहीं गया था. आज स्थिति बदल रही है. देवा का बेटा 12वीं की परीक्षा दे चुका है और अन्य बच्चों को भी स्कूल से जोड़ने की पहल जारी है.
बदलते बस्तर की सबसे प्रेरक तस्वीर यह है कि बारसा देवा का भाई बुधरा बारसा अब सिलगेर में अतिथि शिक्षक बनकर बच्चों को पढ़ा रहा है. कभी माओवादी प्रभाव वाले इलाके में अब वही लोग शिक्षा का दीप जला रहे हैं. बुधरा का कहना है कि हालात बदल चुके हैं और अब वे अपने गांव ओयोपारा में भी स्कूल खोलने की मांग कर रहे हैं.
पहले जहां जनताना स्कूलों में बच्चों को माओवादी विचारधारा और पार्टी दस्तावेज पढ़ाए जाते थे, वहीं अब उनकी जगह लोकतंत्र, संविधान और सामान्य शिक्षा ने ले ली है. जिला शिक्षा अधिकारी जी.आर. मंडावी के अनुसार कोंटा ब्लॉक में 22 नए स्कूलों का प्रस्ताव भेजा गया है और जरूरत के अनुसार आगे भी स्कूल खोले जाएंगे.
बस्तर की यह बदलती तस्वीर साफ संकेत दे रही है कि अब यहां बंदूक की जगह किताबें भविष्य लिख रही हैं और शिक्षा ही विकास की नई राह तय कर रही है.
