जांजगीर-चांपा। जिले के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान बने जाज्वलयदेव लोक महोत्सव इस बार कई सवालों के घेरे में आ गया है। कार्यक्रम में घोषित मुख्य अतिथियों की गैरमौजूदगी ने न केवल आयोजन की गरिमा को प्रभावित किया, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक समन्वय पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। कार्यक्रम में उपस्थिति नहीं होने की जानकारी जिला प्रशासन को पहले से था बाउजूद नियंत्रण कार्ड में इनका नाम छापा गया। और आज उद्घाटन के कुछ घंटे पहले ही वितरण किया गया। निमंत्रण कार्ड नहीं पहुंच पाने के कारण कई जनप्रतिनिधि नाराज भी हैं।
कार्यक्रम के आज उद्घाटन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के वित्त मंत्री ओ पी चौधरी, जांजगीर चांपा सांसद श्री मति कमलेश जांगड़े का नाम निमंत्रण कार्ड में प्रमुखता से छापा गया है, जबकि वे पहले से ही असम दौरे पर थे। वहीं जांजगीर-चांपा के सांसद बजट सत्र के चलते दिल्ली में व्यस्त है। आश्चर्य की बात यह रही कि सांसद के बाहर रहने की जानकारी जिला प्रशासन को पहले से होने के बावजूद उनका नाम भी निमंत्रण पत्र में प्रकाशित किया गया।
सूत्रों की मानें तो जिला प्रशासन को अतिथियों के नहीं आने की जानकारी पहले से था, इसके बावजूद कार्ड में नाम छपना प्रशासनिक लापरवाही या जानबूझकर की गई औपचारिकता प्रतीत होता है।
महोत्सव बना औपचारिक आयोजन?
जिले के गौरव माने जाने वाले इस महोत्सव में इस बार राजनीतिक नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी न के बराबर रही। जांजगीर चांपा लोकसभा की सांसद सांसद, जिले के बीजेपी जिलाध्यक्ष, पूर्व विधायक और पूर्व सांसद तक आयोजन से दूरी बनाए नजर आए। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जिले के बीजेपी नेताओं की निष्क्रियता के कारण जिला प्रशासन की मनमानी हावी रही?
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि जनप्रतिनिधि सक्रिय रहते, तो आयोजन की रूपरेखा और अतिथियों की उपस्थिति को लेकर बेहतर समन्वय संभव था। लेकिन इस बार नेतृत्व की उदासीनता ने प्रशासन को पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ दिया।
जवाबदेही किसकी?
जिले के ऐतिहासिक महोत्सव में इस तरह की अव्यवस्था से आमजन में निराशा देखी गई। जनता के बीच यह चर्चा आम रही कि जब बड़े नेताओं की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं थी, तो उनके नाम निमंत्रण पत्र में क्यों छापे गए? क्या यह महज प्रचार की रणनीति थी या समन्वय की गंभीर कमी?
जाज्वलयदेव लोक महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जिले की आस्था और परंपरा से जुड़ा आयोजन है। ऐसे में इसकी गरिमा बनाए रखना जनप्रतिनिधियों और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है।
अब देखना यह होगा कि भविष्य में इस प्रकार की स्थिति से बचने के लिए प्रशासन और जनप्रतिनिधि क्या कदम उठाते हैं, या फिर यह महोत्सव भी राजनीतिक खींचतान और औपचारिकताओं के बीच अपनी चमक खोता रहेगा।
