अध्यात्म डेस्क। ओडिशा की पवित्र नगरी पुरी में आज यानी 16 जुलाई से विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा का शंखनाद हो गया है। भगवान जगन्नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विशाल रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलेंगे। आस्था के इस सबसे बड़े महोत्सव में शामिल होने के लिए देश-विदेश से करीब 30 लाख श्रद्धालुओं के पुरी पहुंचने का अनुमान है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इस बार प्रशासन ने पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए सुरक्षा के ऐसे अभूतपूर्व इंतजाम किए हैं कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता। जल, थल और नभ से पैनी नजर रखी जा रही है; तटीय रास्तों पर भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल मुस्तैद हैं, तो वहीं जमीन पर 12 हजार से ज्यादा पुलिस जवान और सैकड़ों सीसीटीवी कैमरे हर गतिविधि को रिकॉर्ड कर रहे हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रेलवे ने 300 विशेष ट्रेनें चलाई हैं, तो वहीं शहर भर में डिजिटल स्क्रीन और हाई-टेक संचार टावर लगाए गए हैं ताकि पल-पल की जानकारी भक्तों तक पहुंचती रहे।
यह भव्य आयोजन जितना आस्था से भरा है, उतना ही इसके नियम और इतिहास भी हैरान करने वाले हैं। करीब तीन किलोमीटर लंबे रास्ते ‘बड़ा दांडा’ से होकर यह यात्रा मुख्य मंदिर से शुरू होकर भगवान की मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर तक जाती है। इस नौ दिवसीय उत्सव के लिए तीनों भाई-बहनों के रथ हर साल अक्षय तृतीया से बिल्कुल नए सिरे से बनाए जाते हैं। इन रथों के निर्माण में सदियों पुरानी पारंपरिक कला की झलक मिलती है, जहाँ लगभग 200 बढ़ई और कारीगर बिना किसी आधुनिक मशीन के, सिर्फ अपने पूर्वजों से सीखी पारंपरिक तकनीकों से 40 फीट से भी ऊंचे भव्य रथ तैयार करते हैं। भगवान जगन्नाथ का 16 पहियों वाला लाल-पीला रथ ‘नंदीघोष’ सबसे आगे चलता है, जिसके पीछे बलभद्र जी का ‘तालध्वज’ और सुभद्रा जी का ‘दर्पदलन’ रथ शामिल होता है। इन रथों को खींचने के लिए नारियल के रेशों से बनी 250 फीट लंबी रस्सियों का इस्तेमाल होता है, जिन्हें छूने मात्र के लिए भक्तों में होड़ मच जाती है।
इस अलौकिक यात्रा के पीछे कई दिलचस्प और अनूठी पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। माना जाता है कि यात्रा से ठीक पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन 108 घड़ों के पवित्र जल से स्नान करने के बाद भगवान बीमार पड़ जाते हैं। इसके बाद वे 14-15 दिनों के लिए एकांतवास (अणसर घर) में चले जाते हैं, जहाँ उनके दर्शन बंद रहते हैं। पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद ही वे अपने भक्तों से मिलने बाहर आते हैं। चूंकि जगन्नाथ मंदिर के भीतर गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है, इसलिए इस रथयात्रा का सामाजिक महत्व और बढ़ जाता है; इन नौ दिनों में ब्रह्मांड के नाथ खुद गर्भगृह छोड़कर बाहर आते हैं ताकि अमीर-गरीब, जाति और पंथ के भेदभाव से परे हर आंख उनके दर्शन कर सके। वामदेव संहिता के अनुसार, गुंडिचा मंदिर में सात दिनों तक भगवान के दर्शन करने से इंसानों के सारे पाप कट जाते हैं और पूर्वजों को मोक्ष मिलता है।
यात्रा के दौरान एक बेहद मानवीय और प्यारी कथा भी जुड़ी है, जो भगवान जगन्नाथ और उनकी पत्नी देवी लक्ष्मी के रिश्ते को दर्शाती है। मान्यता है कि महाप्रभु इस यात्रा में अपनी पत्नी को साथ नहीं ले जाते, जिससे नाराज होकर देवी लक्ष्मी चौथे दिन उन्हें ढूंढते हुए गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। नौ दिन बाद जब भगवान ‘बहुदा यात्रा’ के जरिए वापस मुख्य मंदिर लौटते हैं, तो रूठी हुई लक्ष्मी जी को मनाने के लिए उन्हें रसगुल्ले का भोग लगाना पड़ता है, जिसके बाद ही भगवान को मंदिर में प्रवेश मिलता है।
अगर इतिहास के पन्नों को पलटें, तो इस रथ यात्रा का जिक्र स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंगा राजवंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंगा देव ने जब पुरी के मुख्य मंदिर का निर्माण कराया, तब से यह परंपरा और अधिक व्यवस्थित हो गई। हालांकि, इतिहास हमेशा से इतना शांत नहीं रहा; मुगल आक्रमणों के कारण साल 1558 से 1735 के बीच करीब 32 बार इस भव्य रथ यात्रा को रोकना पड़ा था, लेकिन भक्तों की आस्था कभी कम नहीं हुई। पुरी की इसी तर्ज पर आज से करीब 148 साल पहले यानी 1878 में महंत नृसिंहदासजी ने गुजरात के अहमदाबाद में भी रथयात्रा की शुरुआत की थी, जो साबरमती के तट पर आज भी उतनी ही धूमधाम से निकाली जाती है। आस्था, इतिहास और आधुनिक व्यवस्था का यह अनूठा संगम आज पुरी की सड़कों पर साफ देखा जा सकता है, जहाँ ‘जय जगन्नाथ’ के जयकारों से पूरा आसमान गूंज रहा है।
