रायपुर। छत्तीसगढ़ की माटी की सुवास और लोक कला ‘पंडवानी’ को सात समंदर पार एक विशिष्ट पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। 70 वर्ष की आयु में उन्होंने रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में तड़के 3:15 बजे अंतिम सांस ली। वे पिछले कुछ समय से गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। उनके निधन की खबर से देश और दुनिया के कला प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कला जगत की इस महान विभूति के अवसान पर गहरा दुख व्यक्त किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी संवेदनाएं साझा करते हुए लिखा, “सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में एक विशिष्ट पहचान दिलाई। उनका जाना कला एवं संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति!”
भारतीय लोक कला में डॉ. तीजन बाई का योगदान असाधारण और अद्वितीय रहा है। बचपन में औपचारिक शिक्षा से वंचित रहने वाली और साक्षरता अभियान के जरिए किसी तरह पांचवीं तक की दहलीज लांघने वाली तीजन बाई ने अपनी कला के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। उन्हें देश के तीन शीर्ष नागरिक सम्मानों पद्यश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया था। इसके साथ ही, कला के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को देखते हुए उन्हें अलग-अलग विश्वविद्यालयों द्वारा चार बार ‘डी.लिट.’ की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया गया था।
24 अप्रैल 1956 को इस्पात नगरी भिलाई के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्षों की एक जलती हुई मशाल जैसा रहा। पिता चुनुकलाल परधा और माता सुखवती के घर जन्मी तीजन बाई के लिए कला की यह राह कांटों भरी थी। रूढ़िवादी सामाजिक बंधनों के कारण जब उन्होंने पंडवानी गाना शुरू किया, तो समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया था। लेकिन विपरीत परिस्थितियों और सामाजिक बेदखली के बाद भी उन्होंने तंबूरे का साथ नहीं छोड़ा और अपनी कला साधना में लीन रहीं।
पारधी जनजाति से ताल्लुक रखने वाली तीजन बाई ने बचपन में अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कथाएं गाते हुए सुना था, जिससे उनके भीतर इस कला के प्रति बीज अंकुरित हुए। बाद में उनकी अद्भुत प्रतिभा को पहचानकर गायक उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें विधिवत प्रशिक्षण दिया। महज़ 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने मंच पर अपनी पहली प्रस्तुति दी थी। उस दौर में महिलाएं केवल बैठकर ‘वेदमती शैली’ में पंडवानी गा सकती थीं, जबकि पुरुष खड़े होकर हाथ में तंबूरा लेकर ‘कापालिक शैली’ में प्रदर्शन करते थे। तीजन बाई ने सदियों पुरानी इस रूढ़ि को तोड़ा और वे कापालिक शैली में पंडवानी की प्रस्तुति देने वाली देश की पहली महिला कलाकार बनीं। हाथ में तंबूरा लिए जब वे मंच पर ‘भीम’ या ‘अर्जुन’ के रौद्र रूप का आह्वान करती थीं, तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनका जाना लोक संस्कृति के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत है।
