तिरुवनंतपुरम। केरल की राजनीति में दशकों बाद एक बड़ा ऐतिहासिक उलटफेर हुआ है, जहाँ कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (UDF) ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता की चाबी हासिल कर ली है। 140 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के जादुई आंकड़े 71 को पार करते हुए कांग्रेस अकेले 63 सीटें जीतने में सफल रही, जबकि पूरे गठबंधन ने स्पष्ट जनादेश प्राप्त किया है।
इस परिणाम की सबसे बड़ी धमक यह है कि 1960 के दशक के बाद पहली बार भारतीय राजनीति के मानचित्र से वामपंथी सत्ता पूरी तरह सिमट गई है और एलडीएफ (LDF) को मात्र 26 सीटों पर सिमटना पड़ा है। अन्य दलों में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने 22, सीपीआई ने 8, केरल कांग्रेस ने 7 और भाजपा ने 3 सीटों पर जीत दर्ज की है।
इस शानदार जीत के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि केरल का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? इस सवाल पर कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने पार्टी की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए विपक्षी दल भाजपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने साफ किया कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री का चयन भाजपा की तरह ‘कठपुतली’ चुनने जैसा नहीं है, जहाँ दिल्ली से नाम थोप दिए जाते हैं।
शमा मोहम्मद के अनुसार, राज्य में जल्द ही नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक होगी, जिसमें केंद्रीय पर्यवेक्षक की मौजूदगी में सभी की राय ली जाएगी। लोकप्रियता, वरिष्ठता और जमीनी संघर्ष को आधार बनाकर एक रिपोर्ट हाईकमान को भेजी जाएगी, जिसके बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा। केरल का यह चुनाव परिणाम न केवल सत्ता परिवर्तन है, बल्कि देश की राजनीति में वामपंथ के एक युग के अंत का संकेत भी दे रहा है।
