बलरामपुर। रामानुजगंज की जीवनरेखा कही जाने वाली कन्हर नदी, जो भीषण गर्मी के थपेड़ों के बीच मरुस्थल में तब्दील हो चुकी थी, मई की पहली बारिश के साथ एक बार फिर खिलखिला उठी है। अप्रैल के अंत तक जो नदी पूरी तरह सफेद रेत की चादर ओढ़ चुकी थी, उसमें अब पानी की कलकल सुनाई देने लगी है। छत्तीसगढ़ और झारखंड की सरहद को जोड़ने वाली इस नदी की धार लौटने से केवल रामानुजगंज नगर की 25 हजार की आबादी ने ही चैन की सांस नहीं ली है, बल्कि सरहद पार झारखंड के गोदरमना क्षेत्र के हजारों लोगों और प्यासे पशु-पक्षियों को भी नया जीवन मिला है।
बीते पखवाड़े भर से यहाँ हालात इतने बदतर थे कि नगर पालिका को डबरियाँ खोदकर पानी की जुगत लगानी पड़ रही थी, लेकिन प्रकृति की मेहरबानी ने एक ही शाम में मंजर बदल दिया। समाजसेवी विकास दुबे के अनुसार, तापमान में गिरावट और नदी में जलस्तर बढ़ने से क्षेत्र के लोगों को दोहरी राहत मिली है। हालांकि, इस प्राकृतिक राहत के बीच प्रशासनिक अनदेखी का एक ‘रिसाव’ भविष्य पर सवालिया निशान खड़ा कर रहा है।
दरअसल, कन्हर पर बने एनीकट के गेट जर्जर हो चुके हैं, जिसके चलते जमा हो रहा पानी रुकने के बजाय रिसकर बह रहा है। जल संसाधन विभाग के एसडीओ आशीष जगत ने स्वीकार किया है कि गेटों की स्थिति ऐसी है कि उनकी स्थानीय स्तर पर मरम्मत मुमकिन नहीं है। अब जब अम्बिकापुर की विशेषज्ञ टीम को पत्र लिखने की तैयारी की जा रही है, तब तक बारिश का यह अनमोल पानी गेटों के रास्ते बर्बाद होता रहेगा। ऐसे में सवाल यह है कि क्या प्रशासन समय रहते इन द्वारों को दुरुस्त कर इस ‘जीवन’ को सहेज पाएगा, या फिर यह राहत महज चंद दिनों का मेहमान बनकर रह जाएगी।
