बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बलात्कार और बलात्कार के प्रयास के बीच के कानूनी अंतर को स्पष्ट करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने 20 साल पुराने मामले में ट्रायल कोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए आरोपी को बलात्कार (धारा 376) का दोषी मानने के बजाय बलात्कार के प्रयास (धारा 376/511) का दोषी करार दिया है। इसके साथ ही अदालत ने आरोपी को सुनाई गई 7 साल की सजा घटाकर 3 साल 6 माह कर दी है।
मामला वर्ष 2004 का है, जिसमें आरोप था कि आरोपी ने एक युवती को बहला-फुसलाकर अपने घर ले गया और उसके साथ जबरदस्ती करने का प्रयास किया। आरोप के मुताबिक युवती को कमरे में बंद कर उसके हाथ-पैर बांध दिए गए थे। इस प्रकरण में वर्ष 2005 में निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए धारा 376(1) के तहत 7 साल के कठोर कारावास और धारा 342 के तहत 6 महीने की सजा सुनाई थी।
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पीड़िता के बयान और मेडिकल रिपोर्ट का गहन परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि पीड़िता के कथनों में ‘प्रवेश’ को लेकर स्पष्टता नहीं थी और मेडिकल रिपोर्ट में ‘हाइमेन’ सुरक्षित पाया गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून के अनुसार बलात्कार साबित करने के लिए पूर्ण प्रवेश जरूरी नहीं है, लेकिन इस मामले में उपलब्ध साक्ष्य इतने मजबूत नहीं हैं कि इसे पूर्ण दुष्कर्म की श्रेणी में रखा जा सके।
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने आरोपी की सजा को धारा 376(1) से हटाकर धारा 376/511 (बलात्कार का प्रयास) के तहत निर्धारित किया और सजा घटाकर 3 साल 6 माह कर दी। वहीं, धारा 342 के तहत बंधक बनाने की सजा को यथावत रखा गया है और दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
अदालत ने आरोपी के जमानत बांड को निरस्त करते हुए निर्देश दिया है कि वह दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करे। यदि आरोपी निर्धारित समय में सरेंडर नहीं करता, तो पुलिस उसे गिरफ्तार कर शेष सजा पूरी कराएगी।
