Indian Train Facts: जरा कल्पना कीजिए कि आप ट्रेन से सैकड़ों किलोमीटर का सफर कर रहे हों और पूरे डिब्बे में शौचालय जैसी कोई सुविधा ही न हो. न चाहकर भी सफर बीच में छोड़ना पड़े, स्टेशन पर ट्रेन रुकने का इंतजार करना पड़े और वह भी अनिश्चित समय के लिए. आज यह कल्पना अजीब लगती है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब भारतीय ट्रेनों में टॉयलेट नहीं होते थे और यात्रियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ती थी. यह सुविधा हमें यूं ही नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे एक आम यात्री की असहज यात्रा और उसका साहसिक कदम छिपा है.
भारतीय रेलवे की शुरुआत वर्ष 1853 में हुई थी, लेकिन शुरुआती दशकों तक पैसेंजर कोच में शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं थी. लंबी दूरी की यात्रा यात्रियों के धैर्य की परीक्षा बन जाती थी. लोगों को मजबूरी में किसी स्टेशन पर ट्रेन के लंबे ठहराव का इंतजार करना पड़ता था. इसी व्यवस्था की खामी साल 1909 में उस समय उजागर हुई, जब अखिल चंद्र सेन नाम के एक यात्री को ट्रेन यात्रा के दौरान गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ा.
बताया जाता है कि सफर के दौरान अखिल चंद्र सेन का पेट खराब हो गया और मजबूरन उन्हें एक स्टेशन पर उतरना पड़ा. दुर्भाग्य से, जैसे ही वे आवश्यक कार्य से लौटे, ट्रेन चल पड़ी. जल्दबाजी में एक हाथ में पानी का बर्तन और दूसरे हाथ से धोती संभालते हुए उन्होंने ट्रेन पकड़ने की कोशिश की, लेकिन फिसलकर गिर पड़े और ट्रेन छूट गई. यह हादसा केवल एक यात्री की परेशानी नहीं था, बल्कि उस दौर की रेल व्यवस्था की बड़ी खामी को उजागर करने वाला क्षण बन गया.
इस घटना से आहत अखिल चंद्र सेन ने साहिबगंज डिविजनल रेलवे ऑफिस को एक कड़ा पत्र लिखा. अपने पत्र में उन्होंने ट्रेनों में टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधा न होने पर नाराजगी जताई और यात्रियों की कठिनाइयों को अधिकारियों के सामने रखा. यह शिकायत महज एक पत्र नहीं रही, बल्कि रेलवे प्रशासन के लिए आंखें खोलने वाला दस्तावेज साबित हुई. इसके बाद भारतीय रेलवे ने इस दिशा में गंभीरता से विचार करना शुरू किया और धीरे-धीरे पैसेंजर कोच में टॉयलेट की सुविधा विकसित की गई.
आज जब हम ट्रेन में आराम से सफर करते हैं और टॉयलेट जैसी सुविधा को सामान्य मान लेते हैं, तो शायद ही हमें पता होता है कि इसके पीछे एक यात्री का दर्द, उसका अनुभव और एक शिकायत पत्र छिपा है. अखिल चंद्र सेन वही शख्स माने जाते हैं, जिनकी वजह से भारतीय रेल यात्रियों को यह जरूरी सुविधा मिल सकी और रेल यात्रा कहीं अधिक मानवीय और सहज बन पाई.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न रिपोर्ट्स और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित है। फटाफट न्यूज डॉट कॉम इन तथ्यों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है।)
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