अम्बिकापुर. जल, जंगल, जमीन, जैव विविधता और पर्यावरण के विनाश के खिलाफ़ शुक्रवार को अम्बिकापुर में आमसभा का आयोजन हुआ. हसदेव बचाओ संघर्ष समिति के संयोजन में आयोजित इस जनआंदोलन में सरगुजा संभाग के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ग्रामीण, आदिवासी समाज, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी शामिल हुए. आमसभा में राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों के आए वक्ताओं ने खनन परियोजनाओं के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई, ग्रामसभाओं के अधिकारों के दमन और ग्रामीणों के विस्थापन के खिलाफ़ कड़ा विरोध दर्ज कराया गया.
सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि जल-जंगल-जमीन पर आधारित जीवन व्यवस्था से ही पीढ़ियों से लोगों का अस्तित्व जुड़ा है, लेकिन खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर इस व्यवस्था को जबरन छीना जा रहा है. सरगुजा संभाग के हसदेव अरण्य, मैनपाट, सामरी पाट, ओड़गी, भैयाथान, चलगली, तातापानी, आमगांव, अमेरा, प्रेमनगर सहित कई क्षेत्रों में प्रस्तावित और प्रक्रियाधीन कोयला, बॉक्साइट, लिथियम, ग्रेफाइट जैसी 50 से अधिक खनन परियोजनाओं से लाखों हेक्टेयर जंगल के विनाश का खतरा बताया गया.

वक्ताओं ने कहा कि छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर जंगल काटे जा रहे हैं, उसका असर केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा. नदियां सूख रही हैं, जैव विविधता समाप्ति की ओर है और जीव-जंतु विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं. खनन से फैल रहे प्रदूषण के कारण लोगों को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. संसद में प्रस्तुत रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि कोयले की धूल से फेफड़ों को गंभीर क्षति और कैंसर जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं. जंगलों के विनाश से महानदी, गोदावरी और गंगा बेसिन सहित लगभग 12 नदियों के जल प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की चेतावनी दी गई.हसदेव अरण्य को छत्तीसगढ़ का ‘फेफड़ा’ बताते हुए कहा गया कि इसके विनाश से मिनीमाता हसदेव बांगो बांध का अस्तित्व संकट में है और मानव-हाथी संघर्ष लगातार बढ़ रहा है. भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि हसदेव क्षेत्र में खनन की अनुमति से हाथी कॉरिडोर बुरी तरह प्रभावित होगा और मानव-हाथी संघर्ष भविष्य में नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा.
हसदेव अरण्य को छत्तीसगढ़ का ‘फेफड़ा’ बताते हुए कहा गया कि इसके विनाश से मिनीमाता हसदेव बांगो बांध का अस्तित्व संकट में है और मानव-हाथी संघर्ष लगातार बढ़ रहा है. भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि हसदेव क्षेत्र में खनन की अनुमति से हाथी कॉरिडोर बुरी तरह प्रभावित होगा और मानव-हाथी संघर्ष भविष्य में नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा.सभा में रामगढ़ जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल पर मंडराते खतरे पर भी चिंता जताई गई. खनन विस्फोटों के कारण रामगढ़ पहाड़ में दरारें पड़ने और प्राचीन नाट्यशाला सीता भेंगरा के अस्तित्व पर संकट की बात कही गई. नई केते एक्सटेंशन कोयला परियोजना के तहत लाखों पेड़ों की कटाई को सरगुजा की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत पर सीधा हमला बताया गया.
सभा में रामगढ़ जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल पर मंडराते खतरे पर भी चिंता जताई गई. खनन विस्फोटों के कारण रामगढ़ पहाड़ में दरारें पड़ने और प्राचीन नाट्यशाला सीता भेंगरा के अस्तित्व पर संकट की बात कही गई. नई केते एक्सटेंशन कोयला परियोजना के तहत लाखों पेड़ों की कटाई को सरगुजा की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत पर सीधा हमला बताया गया.आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार एक ओर आदिवासी अधिकारों की बात करती है, वहीं दूसरी ओर पेसा कानून, वनाधिकार कानून और भूमि अधिग्रहण कानूनों का उल्लंघन कर कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा दिया जा रहा है. हसदेव क्षेत्र में ग्रामसभाओं के कथित फर्जी प्रस्तावों, जबरन भूमि अधिग्रहण और विरोध कर रहे ग्रामीणों पर दमन का भी मुद्दा उठाया गया. अमेरा, परसोड़ीकलां, तमनार सहित कई क्षेत्रों में ग्रामीणों द्वारा वर्षों से चल रहे विरोध को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया गया.
आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार एक ओर आदिवासी अधिकारों की बात करती है, वहीं दूसरी ओर पेसा कानून, वनाधिकार कानून और भूमि अधिग्रहण कानूनों का उल्लंघन कर कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा दिया जा रहा है. हसदेव क्षेत्र में ग्रामसभाओं के कथित फर्जी प्रस्तावों, जबरन भूमि अधिग्रहण और विरोध कर रहे ग्रामीणों पर दमन का भी मुद्दा उठाया गया. अमेरा, परसोड़ीकलां, तमनार सहित कई क्षेत्रों में ग्रामीणों द्वारा वर्षों से चल रहे विरोध को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया गया.सभा के अंत में वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि जल-जंगल-जमीन और पर्यावरण के इस विनाश को नहीं रोका गया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए छत्तीसगढ़ रहने योग्य नहीं बचेगा. रैली के माध्यम से जंगलों की कटाई पर रोक लगाने, खनिज संपदा की लूट बंद करने और हसदेव अरण्य को खनन मुक्त क्षेत्र घोषित करने की मांग दोहराई गई. आंदोलनकारियों ने कहा कि हसदेव की सुरक्षा केवल एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ और देश के भविष्य की जिम्मेदारी है.
सभा के अंत में वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि जल-जंगल-जमीन और पर्यावरण के इस विनाश को नहीं रोका गया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए छत्तीसगढ़ रहने योग्य नहीं बचेगा. रैली के माध्यम से जंगलों की कटाई पर रोक लगाने, खनिज संपदा की लूट बंद करने और हसदेव अरण्य को खनन मुक्त क्षेत्र घोषित करने की मांग दोहराई गई. आंदोलनकारियों ने कहा कि हसदेव की सुरक्षा केवल एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ और देश के भविष्य की जिम्मेदारी है.
