माइंड न करो उल्लुओं, हर जगह तो आपका राज है…

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यह भी क्या बात हुई भला! अब मनुष्यों ने हमें भी अपनी नीच और घटिया राजनीति में घसीट लिया। जैसे हमारी कोई बखत ही नहीं।’ घनघोर काली रात में लंच के बाद सुस्ताते उल्लुओं की चौपाल पर बैठा एक उल्लू बोल उठा।‘सोचा न था कि ऐसे भी दिन देखने को मिलेंगे। स्कूलों में कभी मास्टरजी बोला करते थे। ठीक है। कोई बात नहीं। इसमें तो हमें गर्व ही होता था। लेकिन राजनीति में भी। छी-छी!’ दूसरे ने बात आगे बढ़ाई।‘हमारे लोग भी राजनीति करते हैं, लेकिन क्या हम कभी मनुष्यों को बीच में लाते हैं भला!’‘दादा, बिल्कुल सही बोला आपने। पहले भी ये लोग हर शाख पे उल्लू बैठा है. जैसी ओछी बातें कहकर हमें लज्जित करते आए हैं।’‘गलती हमारी ही है। कभी विरोध ही नहीं किया।’दो उल्लुओं को उल्लू हित में चिंतन करते देख कुछ और उल्लू भी उनके करीब आ गए। इनमें से अधिकांश को तो पता ही नहीं है कि मुद्दा क्या है, लेकिन सहमति में सिर हिलाए जा रहे हैं, मानो बाहरी समर्थन दे रहे हों। लेकिन एक ठसबुकिया टाइप उल्लू ने पूछ ही लिया, ‘आखिर ऐसा क्या हो गया? हमें भी तो बताओ।’‘हमेशा ठसबुक पर ही लगे रहते हो। कुछ दुनियादारी की भी खबर रखा करो।’ एक समझदार-सा उल्लू बोला।‘भाई, हुआ यह कि राजनीति करने वाले एक आदमी ने कह दिया, चाय बनाने वालों की इज्जत करो, उल्लू बनाने वाले की नहीं। क्या हम चाय से भी गए-बीते हैं? आप शौक से राजनीति करो। हमें कोई लेना-देना नहीं आपकी राजनीति से, लेकिन कृपा करके हमें उसमें घसीटकर हमारा मान-मर्दन तो न करो।’ एक उल्लू ने ठसबुकिया को समझाया। उसके सपाट चेहरे पर पीड़ा उभर आई। ठसबुकिया ने तत्काल अपडेट किया और फिर अपनी दुनिया में खो गया।इस बीच, चौपाल पर उल्लुओं की भीड़ बढ़ती जा रही है। कई युवा उल्लू मुट्ठियां भींच-भींचकर बात कर रहे हैं। जिन्होंने यह मुद्दा उठाया था, अब वे कहीं पीछे भीड़ में खो गए हैं। कुछ दुपट्टेधारी तो कुछ टोपीबाज उल्लू भी चौपाल पर आ गए हैं। भाषणबाजी शुरू हो गई है। स्थिति को विकट जानकार अंतत: देवी को प्रकट होना पड़ा। ‘माइंड न करो उल्लुओ। मुझे ही देख लो। क्या मैंने कभी सोचा था कि इंसान मुझ पर ही कालिख पोत देंगे और काली चवन्नियों को राजनीति में भुनाएंगे? यह हुआ ना। आपको तो खुश होना चाहिए कि राजनीति क्या, हर क्षेत्र में आपकी बिरादरी के लोग ठसे पड़े हैं! थोड़ी बहुत ऊंच-नीच तो झेलनी होगी।’

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