सरगुजा बना मिशाल . यहां के शिविर मे फरियाद करने वालों से ज्यादा होती है अधिकारियों कि संख्या !..

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अम्बिकापुर..(उदयपुर :क्रांति रावत)..जनता की समस्या निवारण करने जनसमस्या निवारण अब कागजी खनापूर्ती बनकर रह गई है..ऐसा हम ना तो कह रहे है..और ना ही आरोप लगा रहे है. स्थिति एकदम स्पष्ठ है..जहाँ अधिकारियों की संख्या ज्यादा और फरियादियों की कम दिखी..

दरसल जिले के उदयपुर ब्लाक के ग्राम चैनपुर में जिलास्तरीय जनसमस्या निवारण शिविर लगा..जहाँ जनता तो कम अधिकारी ज्यादा दिखे..यह नतीजा उस बात को लेकर दिखाई दिया..जहाँ कागजी खानापूर्ति हो रही थी..यह सबकों पता है .की भारतवर्ष मे प्रजातंत्र है ..लेकिन इस देश की प्रजा सरकारी तंत्र से परेशान है..यह वो सरकारी तंत्र है..जिसे करप्शन ने चट कर दिया है..तथा गाँवो में बसने वाले भारतवासियों के मनमे वही बात घरकर गई है. की बगैर पैसे कुछ नही हो सकता..

वही प्रशासन इस बात को मानने को तैयार नही है..वह तो यह सोचता है की उसका दामन दागदार नही है..इसीलिए इन शिविरों का खेल स्थानीय प्रशासन खेलता है..और खेलता आ रहा है..

बता दे कि चैनपुर की इस शिविर की शुरुआत खाली कुर्सियों से हुई . जहाँ जनता जनार्दन तो कम अधिकारी ज्यादे तादाद में मौजूद थे.. ये वे अधिकारी थे .जो ढूंढने पर भी अपने दफ्तरों में नही मिलते थे..फिर क्या शिकायतों का सिलसिला शुरू हुआ और प्रशासन को 78 आवेदन मिले जिसमे से72 विभिन्न मांगों के थे ..तथा 6 शिकायती तहरीर थे..जिसमे से मौके पर मौजूद एसडीएम प्रभाकर पांडे ने 59 आवेदनों का निराकरण कराया और बाकी के 19 आवेदन सरकारी बस्ते में बांध दिए गए..जिनका क्या होगा ..यह खुद एसडीएम साहब को ही नही पता है..भला जिले का जिलास्तरीय जनसमस्या निवारण शिविर हो..और जिसको खुद जिनके खिलाफ शिकायत हो वह लीड रोल की भूमिका में रहे तो भला क्या हो सकता है?..इसका अनुमान आप सहज ही लगा सकते है..की यह शासन से सुशासन का दौर नही बल्कि अंधेर नगरी चौपट राजा वाली कहानी को दोहराता है..

अम्बिकापुर..(उदयपुर :क्रांति रावत)..जनता की समस्या निवारण करने जनसमस्या निवारण अब कागजी खनापूर्ती बनकर रह गई है..ऐसा हम ना तो कह रहे है..और ना ही आरोप लगा रहे है. स्थिति एकदम स्पष्ठ है..जहाँ अधिकारियों की संख्या ज्यादा और फरियादियों की कम दिखी..

दरसल जिले के उदयपुर ब्लाक के ग्राम चैनपुर में जिलास्तरीय जनसमस्या निवारण शिविर लगा..जहाँ जनता तो कम अधिकारी ज्यादा दिखे..यह नतीजा उस बात को लेकर दिखाई दिया..जहाँ कागजी खानापूर्ति हो रही थी..यह सबकों पता है .की भारतवर्ष मे प्रजातंत्र है ..लेकिन इस देश की प्रजा सरकारी तंत्र से परेशान है..यह वो सरकारी तंत्र है..जिसे करप्शन ने चट कर दिया है..तथा गाँवो में बसने वाले भारतवासियों के मनमे वही बात घरकर गई है. की बगैर पैसे कुछ नही हो सकता..

वही प्रशासन इस बात को मानने को तैयार नही है..वह तो यह सोचता है की उसका दामन दागदार नही है..इसीलिए इन शिविरों का खेल स्थानीय प्रशासन खेलता है..और खेलता आ रहा है..

बता दे कि चैनपुर की इस शिविर की शुरुआत खाली कुर्सियों से हुई . जहाँ जनता जनार्दन तो कम अधिकारी ज्यादे तादाद में मौजूद थे.. ये वे अधिकारी थे .जो ढूंढने पर भी अपने दफ्तरों में नही मिलते थे..फिर क्या शिकायतों का सिलसिला शुरू हुआ और प्रशासन को 78 आवेदन मिले जिसमे से72 विभिन्न मांगों के थे ..तथा 6 शिकायती तहरीर थे..जिसमे से मौके पर मौजूद एसडीएम प्रभाकर पांडे ने 59 आवेदनों का निराकरण कराया और बाकी के 19 आवेदन सरकारी बस्ते में बांध दिए गए..जिनका क्या होगा ..यह खुद एसडीएम साहब को ही नही पता है..भला जिले का जिलास्तरीय जनसमस्या निवारण शिविर हो..और जिसको खुद जिनके खिलाफ शिकायत हो वह लीड रोल की भूमिका में रहे तो भला क्या हो सकता है?..इसका अनुमान आप सहज ही लगा सकते है..की यह शासन से सुशासन का दौर नही बल्कि अंधेर नगरी चौपट राजा वाली कहानी को दोहराता है..

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