वीना सिंह के लेख : परित्यक्त महिलाएं और सामाजिक वर्जनाएं

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लेखिका वीना सिंह 

परित्यक्ता शब्द ही पूरे तन और मन में एक पीड़ा का एहसास करा देता है। उन महिलाओं के अंर्तमन को कोई टटोल कर देखे जो निर्दोष होते हुए भी केवल पति के द्वारा ही नही बल्कि पूरे समूचे परिवार तथा समाज के द्वारा एक तिरस्कार भरा जीवन जीने को विवश हैं। आखिर उनका क्या कुसूर ? वे किस अपराध की सजा भुगत रहीं है ? हमारे देश में अनगिनत ऐसी महिलाएं है जिनका पतियों द्वारा परित्याग कर दिया गया हो । यह परित्यक्त महिलाएं एक उपेक्षित व कठिनाईयों भरा जीवन व्यतीत करती है । अपनों के द्वारा ठुकराई गई इन महिलाओं के कष्टमय जीवन के बारे में जानने का व सुधारने का देश व समाज के पास न कोई उपाय है न इच्छा । गलती हो या न हों ए दोषी भी यही ठहराई जाती है ए ऐसी निम्न सोच है हमारे समाज की।

यदि किसी लड़की का विवाह बचपन में कर दिया जाए या बेमेल जोड़ा बना दिया जाए तो यह त्रुटि परिवार के सदस्यों की है जो सामाजिक कुरीतियों से ग्रस्त गलत निर्णय लेते हैं हमारे समाज के एक बड़े तबके में अभी भी यह धारणा व्याप्त है कि लड़की का विवाह मासिक धर्म शुरू होने से पहले कर देने से पुण्य प्राप्त होता है। यह हमारे समाज की कैसी ओछी सोंच है कि अपनी ही बेटी के भविष्य को अंधकारमय बना कर पुण्य प्राप्त कर लें। पुण्य प्राप्त करने के चक्कर में वे कितना बड़ा पाप कर बैठते हैं उन्हें पता भी नहीं चलता कि वे अपनी ही संतान का जीवन कठिनाईयों से भर रहे हैं। मासिक धर्म शुरू से ही महिलाओं की अपवित्रता का सूचक माना गया है। हमारे समाज में दीमक लगी मानसिकता का ही यह एक नमूना है जो अनजाने में अपने ही बच्चों के साथ खिलवाड़ कर बैठते हैं ऐसी ही न जाने कितनी सामाजिक कुरीतियों की मार यह नासमझ बच्चे ताउम्र झेलने को विवश होते हैं। हमारे समाज में कुछ ऐसी ही मान्यता है कि विवाह के बाद लड़की की पूरी जिम्मेदारी पति की ही है और पति छोड़ कर चला जाए ऐसे में बेचारी लड़की क्या करे? कुछ लोगों का मानना है कि जोड़ियां बनाना ऊपर वाले का काम है और यदि यह वास्तविकता है तो मैं ईश्वर से निवेदन करना चाहूंगी कि वे संसार में ऐसे बेतुके और बेमेल जोड़े न बनाये जो नदी के दो किनारों की भांति एक दूसरे के पूरक हाने के उपरान्त भी कभी साथ न हो सकें और यदि माता-पिता के पास यह अधिकार सुरक्षित है तो वे बच्चों के भविष्य के साथ खिलबाड़ न करें।

अत; बदलते हुए समय में स्वयं की सोच को बदलें तथा बच्चों को सही समय पर स्वयं ही जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता दें। समय चाहें जो भी रहा हो पुरुषों को अकारण ही कभी भी नि;अपराध पत्नी को त्याग देने की स्वतंत्रता रही है । त्रेत्रायुग की एक छोटी सी झलक प्रस्तुत है-दशरथ पुत्र भरत और शत्रुघ्न दोनो भाई बारह बर्षो के लिए अपनी पत्नियों को घर में छोड़कर ननिहाल चले गये। लक्ष्मण श्री राम की सेवा हेतु अपनी पत्नी उर्मिला को छोड़कर चैदह बर्षों के लिए वन चले गये। श्री रामचन्द्रजी ने निर्दोष सीताजी का उस समय परित्याग कर दिया जब वह गर्भवती थी। इसी प्रकार एक छोटी सी भूल पर शिवजी ने सती जी का त्याग कर दिया। जब देवता अपनी पत्नियों के साथ अन्याय करने से नहीं चूके तो फिर मनुष्य क्यों न अपना प्रभुत्व दिखायें। तब भी महिलाएं चुपचाप सहती थी और आज भी। तभी तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है-

वृद्ध ए रोगबस ए जड़ ए धनहीना। अंध ए बधिर ए क्रोधी ए अति दीना । ।

ऐसेउ पतिकर किय अपमाना । नारि पाव जमपुर दुख नाना । ।

कुछ ऐसा ही भागवत में भी कहा गया है-

दु;शीलो दुर्भगो ए वृद्धो ए जड़ो ए रोग्यधनोअपि वा।
पति; स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्यसुभिरपातकी । ।

उर्पयुक्त चैपाई और श्लोक से तो यही स्पष्ट होता है कि पति चाहें जैसा हो पत्नी अपना धर्म अवश्य निभाए। नहीं तो वह पाप की भागी होगी । जब रामराज्य में स्त्रियों की स्थिति इतनी दयनीय रही तो यह तो कलयुग है। ऊपर से पुरुष प्रधान देश। यहां तो पुरुषों के लिए सब मान्य है।
ऐसा लगता है कि समाज की कुरीतियों ए रूढ़ियों को तोड़ने की जगह हम सब उन्हीं में जीने के आदी हो गये हैं। उन महिलाओं के कष्टमय जीवन का वर्णन करना बहुत ही मुश्किल है जिन्हे उनके पूज्य पति जीवन के बीच राह में अकेला छोड़ कर चले गये। हर दिन हर पल एक नये संर्घष से उनका सामना होता है तथा वे ईश्वर द्वारा प्रदत्त बहुमूल्य जीवन एक बोझ की भांति ढोने पर विवश हैं। समाज उन पर तरह-तरह के लांछन लगाता हैं जैसे अपने बिगड़े जीवन के लिए वे स्वयं कसूरवार हैं। पति ने साथ छोड़ दिया इसके लिए पति का नहीं उनका ही कोई दोष है ऐसा उन्हें सोचने पर मजबूर किया जाता है। वैसे तो उसे अपशकुनी कह कर सभी समाज के मांगलिक कार्यो से वंचित रखा जाता है लेकिन उसी अपशकुनी के चारो ओर समाज के ससंमानित पुरुष चक्कर लगाते नजर आते हैं। हमारे पुरुष प्रधान देश में पुरुष अपनी धूर्तता को भी प्रबल पौरुष का एक गुण मानते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं का घर से बाहर निकल कर कार्य करना भी आसान नहीं होता ऐसी स्थिति में समाज द्वारा उपेक्षित वे महिलाएं उनकी धृष्टता को चुपचाप सहती रहतीं हैं परन्तु बहुत सी महिलाएं उनकी बुरी भावनाओं की शिकार होकर टूट जाती हैं उन्हें अपना जीवन एक अभिशाप सा लगने लगता है अत; वे अपनी जीवन लीला को समाप्त करना ही उचित समझती हैं क्योंकि वे जानती है कि तन ए मन ए धन से निर्बल होने के साथ-साथ समाज में उनका स्थान नगण्य है इसलिए विरोध करना उनके लिए सहज नहीं है शायद इसीलिए न अपने सम्मान या अधिकार के लिए समाज से लड़ाई ए न कोई कानूनी लड़ाई की इच्छा। जैसे हर स्थिति को सहना उनकी नियति बन गयी हो।

आज के बदलते परिवेश में यदि कुछ महिलाएं कानून का सहारा लेकर अपने अधिकारों को पाने में सफल हो भी जाती हैं फिर भी वे समाज में अपना सम्मानित स्थान नहीं पा पाती उन्हें हेय दृष्टि से ही देखा जाता है अतीत उनका साथ नहीं छोड़ता। हमारे समाज को रूढ़िवादिता की जड़ों ने इतनी मजबूती से जकड़ रखा है कि हम उन्हंे लेशमात्र भी हिलाने में समर्थ नहीं है। सदियों पुरानी रीति-रिवाजों को हम जस का तस अपने जीवन में उतारते आए है और आने वाली नई पीढ़ी से भी उन्ही रीति-रिवाजों के अनुरूप चलने की अपेक्षा करते है । इस प्रकार हमारी जंग लगी सोच पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रहती है। ऐसे तो कभी भी सामाजिक बदलाव संभव ही नहीं है। नये-नये नियम कानून बना कर समाज की विसंगतियों तथा कुरीतियों को बदलनें का प्रयत्न भी हमारे समाज की कुन्द मानसिकता के समक्ष बेअसर है । आज भी समाज बहुत बड़ा हिस्सा अशिक्षा के घोर अंधकार से घिरा हुआ है परन्तु जो शिक्षित समाज है उसमें भी बालविवाह ए बेमेल विवाह बहुतायत में हो रहे हैं जिसका परिणाम देश की अनेंकों महिलाएं जीवन पर्यन्त झेलती हैं और उनसे झेलने की ही अपेक्षा की जाती है। अपने मन का एक कदम भी चलने की अनुमति नहीं है। वे भी इंसान हैं उनके अन्दर भी इच्छाएं अपेक्षाएं हैं आखिर उनकी पीड़ा का कोई तो निराकरण सोचे और उनके अंधकार भरे जीवन में प्रकाश की एक लौ दिखाये।

 

लेखिका – वीना सिंह

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