सावन में कैसे करें शिव की उपासना.. कैसे हरेंगे आपके संकट…

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एक माह में शिव हरेंगे सभी कष्ट

श्रावण या सावन शब्द उच्चारित होते ही मन में उत्साह और उमंग उमड पडता है। श्रावण मास की वर्षा से जहाँ एक ओर प्रकृति अमृत सदृष्य वर्षा से स्वयं को सराबोर करती है, वहीं प्राणिमात्र को भी अपनी हरी आभा से उत्साहित करती है।

श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना का बहुत अधिक महत्व है। शिव ‘अभिषेक प्रिय’ हैं, और ऐसा लगता है मानो प्रकृति इस मास में जल की वर्षा केवल शिव के अभिषेक के लिये ही करती है। शास्त्रों में शिव की आराधना को ‘आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा: प्राणा: शरीरं गृहं’ कहकर सम्बोधित किया गया है, अर्थात शिव और शक्ति  क्रमश: आत्मा और मति के रूप में विराजमान हो मेरे शरीर को पूर्णता प्रदान करें। समस्त आकारों के सृजनकर्ता शिव हैं तो स्वयं निराकार भी शिव ही हैं। अभिव्यक्ति के लिये स्वर के कारक महादेव स्वयं हैं और परम शांति के उद्भवकर्ता शिव ही हैं। स्वयं जटाजूट धारण करने वाले और विष प्रेरित सर्प को आभुषण के रूप में धारण करने वाले शिव सभी ऐश्वर्य के अधिष्ठाता देव हैं।

सभी दिशाओं के स्वामी,जल थल, आकाश और यहाँ तक कि पाताल के स्वामी भी शिव ही हैं। सावन का महिना जिसमें तीनों लोकों के देवताओं की शक्ति शिवशंकर के हाथों में समा जाती है। प्रकृति खुद भी अपनी मौन धारण तोड़ कर सभी के साथ झूमने लगती है। तभी तो सावन के महिने को सभी साल का सबसे खास महिना कहा जाता है। सावन के महिने में की जाने वाली पूजा एक तरह की प्रकृति की ही पूजा मानी जाती है, क्योंकि भगवान भोलेनाथ को प्रकृति का रूप कहा गया है। इसी कारण यह महिना काफी श्रेष्ठ फल देने वाला महिना कहा जाता है। जिसमें लोग भगवान को अपनी श्रृद्धा भक्ति के भाव को समर्पित करने के लिए व्रत रखते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार सावन के महिने में सोमवार के दिन व्रत रखना काफी महत्वपूर्ण बताया गया है। क्योंकि शिव भक्ति में सावन के सोमवार को साल भर रहने वाले सोमवार के व्रतों से अधिक पुण्य देने वाला बताया गया है।

शिव हैं निराकार

वैसे यदि शिव के शाब्दिक अर्थ की विवेचना की जाये तो ‘शिव’ तभी सत्य है या प्राणवान है जब उसमें शक्ति की ‘ई’ मात्रा लगी हुई है, अन्यथा यह शक्ति विहीन होकर ‘शव’ सदृश्य है। यदि इसे सांसारिक अर्थों में विश्लेशित किया जाये तो स्पष्ट हो जाता है कि शिव अर्थात सार्वभौम सत्य को भी अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिये शक्ति की आवश्यकता पडती है, यह शक्ति ज्ञान स्वरूप या अर्थ अर्थात सम्पन्नता के स्वरूप में हो सकती है। स्पष्ट है कि शिव जिनका पूजन पशुपति के रूप में आज से हजारों वर्ष पूर्व भे किया जाता रहा, कालांतर में लिंग रूप में उनका पूजन हुआ जो आज भी प्रचलित है, वास्तव में निराकार हैं और प्रत्येक पाणी में अंतर्निहीत हैं।

श्रावण सोमवार का अत्याधिक महत्त्व है| स्मृत्यन्तर में लिखा है की श्रावण सोमवार को शिव जी का अभिषेक मात्र सभी कष्टों और क्लेशो से मुक्ति दिलाता है| इस  श्रावण मास  का महत्त्व ज्यादा इसीलिए है क्यों की लगभग 400 वर्ष बाद एसा हो रहा है की श्रावण मास के पहले दिन और आखरी सिन सोमवार और श्रवण नक्षत्र की युति है|

श्रावण शुक्रवार को शिवजी का अभिषेक करने के पश्चात लक्ष्मी जी का पूजन करने से अतुल धन संपदा प्राप्त होती है|

एक माह में प्राप्त करें सब कुछ

1.: .स्वयं के भवन की प्राप्ति, आर्थिक लाभ और ऋण मुक्ति हेतु: शिवजी का बेल के शर्बत के रस से अभिषेक करें। सूपा और काला छाता किसी भी सोमवार को दान कर मंत्र ‘‘धन समृद्धि प्रदाय श्रीमन महदेवाय नम:’’ का जाप प्रतिदिन करें। 2.शीघ्र विवाह हेतु: प्रत्येक श्रावण सोमवार को युवक केसर युक्त दूध से और युवतियां अनार के रस से शिवजी का अभिषेक करें। पूरे श्रावण मास में प्रतिदिनह्रीं ह्रीं गिरिजा पतये शिवशंकराय ह्रीं ह्रीं’’ मंत्र का जाप 108 बार करें।

3.रोजगार की प्राप्ति के लिये: सर्प का पूजन करने के पश्चात शिव जी का अभिषेक कर एक कमल का पुष्प अर्पित करें। ह्रीं शम्भवाय ह्रीं मंत्र से प्रतिदिन शिवजी का जल से अभिषेक करें।

4 विध्यार्थी: प्रत्येक श्रावण सोमवार को 11 बेल पत्र पर लाल चन्दन लगाकर शिव चालीसा का पाठ करने के उपरांत अर्पित करें। प्रतिदिन शिवशंकराय ह्रीं मंत्र का जाप करें।

मनोकामना के अनुसार चयन करें शिव लिंग का

श्रावण मास में विभिन्न वस्तुओं से बने शिवलिंग को बना कर पूरे माह आराधना करने से विभिन्न अभिष्टों की प्राप्ति होती है:

  1. सभी कामनाओं की पूर्ति हेतु: नदी के तट की मिट्टी के शिव लिंग
  2. विरोधियों से बचाव: कलावा के शिवलिंग:
  3. विवाह, लक्ष्मी प्राप्ति और शांति हेतु: स्फटिक के शिवलिंग
  4. पारीवारिक सुख और शांति: कपूर और कुंकुम के शिवलिंग
  5. राजनीतिक सफलता: सफेद कनेर या कमल के फूल का शिवलिंग
  6. संतान प्राप्ति: आटे या फलों के शिवलिंग
  7. सभी क्षेत्रों में उन्नति और शांति : पारद शिवलिंग

      8. उत्तम स्वास्थ्य: गुड और शक्कर के शिवलिंग

  1. आर्थिक और पारीवारिक समृद्धि: विभिन्न धान्य के शिवलिंग
  2. अकाल मृत्यु से रक्षा: दुर्वा के शिवलिंग

ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक कहा गया है कि पृथ्वी समेत अन्य सभी ग्रह सूर्य के चक्कर लगाते हैं। पर वहीं चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है, क्योंकि वह एक उपग्रह है। जिसका व्यावहारिक असर हम अपने जीवन में भी देखते हैं। चन्द्रमा का प्रभाव मानव जीवन के साथ-साथ पूरे जगत पर भी पड़ता है। जिसका सबसे बड़ा जीता जागता प्रमाण है पूर्णिमा की रात, जब चन्द्रमा अपने पूर्ण आकार में दिखाई देता है, तब समुद्र में ज्वार के आने की संभावनाएं बढ़ जाती है। वहीं अमावस्या के समय चन्द्रमा अदृश्य होता है, तब समुद्र की लहरें भी पूरी तरह से शांत हो जाती है। इस प्रकार आकाश में चन्द्रमा के आकार के घटने-बढ़ने के साथ-साथ पानी और अन्य चीजों में भी हलचल बढ़ने और घटने लगती है। चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक रहने वाला उपग्रह है और इसी निकटता के कारण ही हमारे जीवन के हर कार्य व्यवहार पर उसका सबसे अधिक असर पड़ता है।

यही कारण है कि जिन लोगों में चंद्रमा का प्रभाव ज्यादा होता है। वे लोग पूर्णिमा के आस-पास अधिक उद्दण्ड, क्रोधित और आक्रामक हो जाते है। जबकि अमावस्या के समय एकदम शांत और गंभीर दिखने लगते है। धार्मिक दृष्टि के अनुसार जलतत्व राशि वालों को जैसे मीन, कर्क, वृश्चिक वाले महिला-पुरूष को सोमवार का व्रत रखने के अलावा चंद्र देव का  पूजन भी जरूर करना चाहिए। इससे ऐसे लोगोका दिमाग शांत होने के साथ मानसिक संतुष्टि, मन की चंचलता को रोकने की शक्ति मिलती है। जिनकी राशि में चंद्रदोष होता है उन्हें शांति के लिए स्फटिक की माला या मोती की माला को धारण करना शुभ माना जाता है। इसलिए सोमवार के दिन व्रत रखकर शिव पूजा करने से चंद्र पूजा होने के साथ चंद्र दोष दूर होते है। साथ ही इन व्यक्तियों के सारे कष्ट दूर हो जाते

व्रत विधि- सावन में सोमवार के व्रत का पूजन करने से पहले भगवान श्री गणेश जी का सर्वप्रथम पूजन करना चाहिए। इसके बाद भगवान शिव जी, माता पार्वती व नन्दी देव की पूजा करनी चाहिए। पूजन सामग्री में दूध, दही, जल, शहद, घी, चीनी मोली, पंचामृ्त, वस्त्र, चन्दन, जनेऊ, रोली, बेल-पत्र, चावल, आक-धतूरा, फूल, भांग, पान-सुपारी, इलायची, कमल गठ्टा, प्रसाद, लौंग, मेवा के साथ दक्षिणा चढ़ाई जाती है।

शिव पूजन में बेलपत्र प्रयोग करना जरूरी – भगवान शिव की पूजा के समय बेलपत्र का होना सबसे जरूरी माना जाता है। इसका प्रयोग करने से तो भगवान अपने भक्त की मनोकामना बिना कहे ही पूरी कर देते है। बेलपत्र के बारे में कहा जाता है कि बेल के पेड को जो इंसान पानी या गंगाजल से सींचता है, वह समस्त लोकों का सुख भोगकर, शिवलोक में प्रस्थान करता है।

पौराणिक मान्यता- पौराणिक धारणाओं के अनुसार सोमवार का व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिवशंकर को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए रखा था। इसी व्रत के शुभ फलों के स्वरूप उन्हें भगवान शिव की प्राप्ति पति के रूप में हुई थी। इसलिए जो भी कन्या इस व्रत को पूरे श्रृद्धा भक्ति भाव के साथ करती है उसको शादी जल्द हो जाती है। इस व्रत का फल जल्द ही प्राप्त होता है। यह व्रत मुख्य रूप से परिवार और समाज को भी समर्पित है। इसके अलावा यह व्रत प्रेम, आपसी भाई-चारे विश्वास और मेलजोल के साथ जीवन जीने का सबसे बड़ा संदेश देता है। सावन में सोमवार के व्रत को करने से सभी बाधाएं दूर हो जाती है। यह व्रत सोलह सोमवार के व्रत से भी उत्तम माना गया है। सावन के महीने में जो भी भक्त भगवान शिव की श्रद्धाभाव के साथ पूजा-अर्चना करता है, उसे शिव कृपा ज़रूर प्राप्त होती है। ऐसा भी माना जाता है कि विवाहित महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन को सुखमय व अविवाहित महिलाएं अच्छे वर की कामना के लिए इस व्रत को रखती हैं। वहीं सावन में भगवान शिव के पूजन व व्रत से लंबी आयु का वरदान भी प्राप्त होता है।

व्रत के नियम – व्रतधारी को ब्रह्म मुर्हत में उठकर पानी में कुछ काले तिल डालकर नहाना चाहिए। भगवान शिव का अभिषेक जल या गंगाजल से होता है परंतु विशेष अवसर व विशेष मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दूध, दही, घी, शहद, चने की दाल, सरसों तेल, काले तिल, आदि कई सामग्रियों से अभिषेक की विधि प्रचिलत है। तत्पश्चात ऊँ नमः शिवाय मंत्र के द्वारा श्वेत फूल, सफेद चंदन, चावल, पंचामृत, सुपारी, फल और गंगाजल या साफ पानी से भगवान शिव और पार्वती का पूजन करना चाहिए। मान्यता है कि अभिषेक के दौरान पूजन विधि के साथ-साथ मंत्रों का जाप भी बेहद आवश्यक माना गया है फिर महामृत्युंजय मंत्र का जाप हो, गायत्री मंत्र हो या फिर भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र। शिव-पार्वती की पूजा के बाद सावन के सोमवार की व्रत कथा करें। आरती करने के बाद भोग लगाएं और घर परिवार में बांटने के पश्चात स्वयं ग्रहण करें।

दिन में केवल एक समय नमक रहित भोजन ग्रहण करें। श्रद्धापूर्वक व्रत करें। अगर पूरे दिन व्रत रखना सम्भव न हो तो सूर्यास्त तक भी व्रत कर सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र में दूध को चंद्र ग्रह से संबंधित माना गया है क्योंकि दोनों की प्रकृति शीतलता प्रदान करने वाली होती है। चंद्र ग्रह से संबंधित समस्त दोषों का निवारण करने के लिए सोमवार को महादेव पर दूध अर्पित करें। समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए शिवलिंग पर प्रतिदिन गाय का कच्चा दूध अर्पित करें।

राशी के अनुसार करें शिव को प्रसन्न

पूरे श्रावण मास भर यदि अपनी राशी के अनुसार शिव जी का पूजन करें तो निश्चित ही सभी ग्रहों की शांति होती है, और एक माह में ही प्रगति की सम्भावनाएं बन जाती हैं:

1.मेष: मंत्र ऊँ पिनाकिने नम: का उच्चारण करते हुए केसर दूध से अभिषेक करें।

2.वृषभ: मंत्र ऊँ शशिशेखराय नम: का उच्चारण करते हुए मिश्री दूध से अभिषेक करें।

3.मिथुन:मंत्र ऊँ विध्या निधिये नम: का उच्चारण करते हुए विधारा युक्त जल से अभिषेक करें।

4.कर्क: मंत्र ऊँ चन्द्र धारिणे नम: का उच्चारण करते हुए गौ दूध से अभिषेक करें।

5.सिंह: मंत्र ऊँ सूर्य सदृशाय शिवाय नम: का उच्चारण करते हुए अनार के रस से अभिषेक करें।

6.कन्या:मंत्र ऊँ अम्बिकानाथाय नम: का उच्चारण करते हुए शुद्ध सुगन्धित जल से अभिषेक करें।

7.तुला: मंत्र ऊँ श्री भक्त वत्सलाय नम: का उच्चारण करते हुए शक्कर दूध से अभिषेक करें।

8.वृश्चिक: मंत्र ऊँ वामदेवाय नम: का उच्चारण करते हुए शहद दूध से अभिषेक करें।

9.धनु: मंत्र ऊँ अधोक्षजाय नम: का उच्चारण करते हुए केसर दूध से अभिषेक करें।

10.मकर: मंत्र ऊँ भस्मोद्धूलित विग्रहाय नम: का उच्चारण करते हुए फलों के रस से अभिषेक करें।

11.कुम्भ: मंत्र ऊँ ज्वालामालिने नम: का उच्चारण करते हुए बेल के रस से अभिषेक करें।

12.मीन: मंत्र ऊँ श्रीकंठाय नम: का उच्चारण करते हुए पंचामृत से अभिषेक करें।