सब्जी बेचने वाले की बेटी बनी नायब तहसीलदार

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अम्बिकापुर 

बतौली से निलय 

मन में अटूट लगन और संघर्षो पर जीत हासिल करने का आत्मविश्वास हो तो कोई भी मंजिल मुस्किल नहीं होती। इस बात को सही साबित कर दिखाया है सरगुजा के बतौली विकासखंड के सिलमा पंचायत की युवती ने। साधारण किसान परिवार में जन्मी उमा सिंह ने राज्य सेवा आयोग की परीक्षा 2015 की चयन सूची में स्थान बनाया और नायब तहसीलदार के पद पर चयनित हो चुकी है।

उमा सिंह बचपन से ही प्रतिभाशाली थी पिता केशव सिंह पैकरा एक मामूली किसान है, फसल लगा कर और बाजार में शब्जी बेच कर ही परिवार का भरण पोषण होता है। उमा की माँ रामेश्वरी बाई शब्जी बेच कर बच्चो की पढ़ाई लिखाई का खर्चा उठाया है। उमा में गरीब माँ बाप ने बड़ी ही मेहनत से बच्चो का पालन पोषण किया है और उनकी मेहनत के परिणाम के रूप में आज उनकी बड़ी बेटी उमा सिंह नायब तहसीलदार बन कर ना सिर्फ परिवार का बल्कि पूरे जिले का मन बढाया है। बेटी के नायब तहसीलदार बनने की खबर सुनते ही इस परिवार सहित पूरे गाँव में खुशी की लहर है। अपनी इस सफलता के बाद उमा अपने परिवार के संघर्षो को याद करती है और अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने परिवार की अथक मेहनत को देती है। सफलता मिलने के बाद भी उमा के जज्बे में कोई कमी नहीं आई है वह अभी भी रायपुर में रहकर अपनी पढ़ाई अनवरत जारी रखे हुए है।

संघर्षो में भी रही प्रतिभावान

अमूमन पारिवारिक स्थित और ग्रामीण माहौल में छात्र पढ़ाई में रूचि नहीं रख पाते है लेकिन उमा के रास्ते में ये सारी चीजे रुकावट नहीं बन सकी वह बचपन से ही प्रतिभावन थी। उमा ने प्रायमरी व माध्यमिक स्कूल की शिक्षा बतौली के शान्तिपारा मिशन स्कूल से प्राप्त की और हाई स्कूल व हायर सेकेंडरी की पढ़ाई बनया स्थित संत मोंटफोर्ट स्कूल से प्राप्त की और उच्च शिक्षा के लिए उमा अम्बिकापुर के साईं बाबा आदर्श महाविद्द्यालय से पढ़ाई की जहां उमा से विज्ञान विषय से स्नातक किया, इसके बाद उमा ने रायपुर जाकर पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्द्यालय से मानव विज्ञान विषय से स्नातकोत्तर की उपाधी प्राप्त की स्नातकोत्तर का अंतिम वर्ष पूरा होते ही उमा ने फरवारी 2016 में पीएससी की प्रारम्भिक परिक्षा पास की और जून 2016 में आयोजित राज्य मुख्य परिक्षा में भाग लिया और इस परिक्षा के अंतिम परिणाम में उमा का एस सी कैटेगरी में 43 रैंक में नायब तहसीलदार के पद पर चयन हो गया।

कोचिंग के लिए नहीं थे पैसे

उमा के परिवार की आर्थिक हालात ठीक ना होने की वजह से पढ़ाई में आने वाली दिक्कतों से उमा शुरू से ही सतर्क थी और हुआ भी वही प्रारम्भिक परीक्षा की कोचिंग के बाद मुख्य परीक्षा में कोचिंग के लिए 25000 रुपयों की जरूरत थी उसने इसकी जानकारी माता पिता को दी लेकिन उस वक्त परिवार के हालात पक्ष में नहीं थे लिहाजा उमा मुख्य परिक्षा के लिए कोचिंग नहीं कर पाई बावजूद इसके उमा का चयन नायब तहसीलदार के लिए हो गया है उमा का मानना है की अगर उसे थोड़ी और मदद मिलती तो उसका चयन और उच्च पद पर हो सकता था।