भूख से तड़पता बचपन और स्मार्ट क्लास से क्रान्ति की उम्मीद …!

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[highlight color=”black”]रायपुर  हितेष शर्मा[/highlight][highlight color=”orange”]/देश दीपक “सचिन”[/highlight]

जिले सहित ग्रामीण क्षेत्रों में दिनों-दिन बाल श्रमिकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। मजबूरी हो या शिक्षा का अभाव आखिर इन बाल श्रमिकों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। आज इन बाल मजदूरों को होटल, ढाबों सहित विभिन्न जगहों पर कार्य करते हुए देखा जा सकता है। इन बाल मजदूरों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। कोई पारिवारिक मजदूरी के चलते बाल श्रम जैसे कार्य पर लगे हुए है। तो किसी मासूम पर दबाव बनाकर बाल श्रम जैसे कार्य कराएं जा रहे है। इन बाल श्रमिकों को यह भी पता नहीं रहता कि इनका आने वाला भविष्य कैसा होगा..?

खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में बाल मजदूरों को मजदूरी करते देखा जा सकता है। बाल मजदूरों को होटल, ढाबों सहित कबाड़ी दुकानों में मजदूरी करते देखा जा रहा है। बावजूद इसके इन बाल मजदूरों से काम लेने वाले लोगों पर कार्यवाही नहीं की जा रही है। ऐसी स्थिति में बाल मजदूरों का भविष्य चिंतित विषय बनकर रह गया है। शहर में ऐसे बच्चों की तादाद कम नहीं है, जो पेट की खातिर पीठ पर कचरा लादकर अपना व अपने परिवार की मदद करते है। दूसरी ओर उन बच्चों की संख्या भी बढ़ती जा रही है जो अपने परिवार की गरीबी को महसूस कर छोटी उम्र में ही बाल श्रमिक बन जाते है। स्कूल जाने की उम्र में ये कहीं भी काम करते दिख जाते है। काम करना इनका शौक नहीं बल्कि मजबूरी है। माना जा रहा हैकी इनकी मजदूरी का फायदा उठाया जाता है लेकिन इनके पास गरीबी से लडऩे का कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। शहर में कचरों के ढेर में छोटे-छोटे बच्चे अपने लिए उपयोगी कागज, पुराना लोहा, टीना तरासते आसानी से नजर आ जाते है। खास बात ये है कि जिन जगहों के पास से लोग गुजरना पसंद नहीं करते ऐसे गंदे स्थानों में ही ये बच्चे अपने व अपने परिवार के पेट की खातिर रोटी के इंतजाम में लगे रहते है। जो उपयोगी चींजे इन्हें मिलती है उसे किसी बोरी में भर कर पीठ पर लादकर किसी कबाड़ी की दुकान में बेच देते है। कबाड़ी किलों के भाव से जो रकम उसे दे दे वही उसकी व उसके परिवार की गुजर बसर का माध्यम बनता है। इस तरह काम करते हुए ये अपनी जिंदगी बिताते है। इन्ही की तरह कुछ बच्चे जो इस कार्य को नहीं करते लेकिन वे भी गरीबी की वजह से शिक्षा से महरूम रहते है। उनके कार्य करने का ढंग इनसे कुछ अलग रहता है। ये बच्चे अपने परिवार की मदद के लिए होटल, ढाबा चाय ठेलों में मेहनत करते या साग सब्जी बेचते नजर आ जाते है

 

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[highlight color=”green”]क्या इन मासुमों पर दबाव..?[/highlight]

कुछ बच्चे तो अपनी पारिवारिक व आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण मजदूरी करते है तो कुछ बच्चे दबाव में आकर बाल मजदूरी जैसे कामों में लग जाते है। वजह कुछ भी हो लेकिन इनका भविष्य तो अधंकार में गुम हो रहा है। इन बच्चों को आखिर कब तक इस तरह अपने बचपन से खिलवाड़ करना पड़ेगा ये बच्चे न चाहते हुए भी दबाव या मजबूरी के कारण कच्ची उम्र में ही श्रम करते रहते है और इस तरह से ये बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते है। शिक्षा की इनको उतनी ही जरूरत है जितनी सभी के लिए होती है।ये बच्चे श्रम की दिशा में इतने खींचे चले जा रहे है कि इन्हें स्कूलों का अर्थ भी समझ में नहीं आता। इन बच्चों को बाल मजदूरी जैसे धंधे में इस तरह डूबो दिया जाता है कि मानों उस बच्चे को पढ़ाई-लिखाई से कुछ मतलब ही नहीं है, ये शिक्षा के अभाव में लगातार दिशाहीन होते जा रहे है। इन बच्चों को ये भी अंदाजा नहीं है कि इनका आने वाला भविष्य कैसा होगा और ये आगे चल कर क्या करेंगे। इन्हे दिशा मिलेगी भी कि नहीं यह चिंता का विषय बन कर रह गया है।

[highlight color=”green”]शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में बाल मजदूर[/highlight]

बाल मजदूरों को ज्यादातर वनांचल क्षेत्रों में ही कार्य करते देखा जा सकता है। इन बाल मजदूरों को या तो मजबूरी वश मजदूरी करनी पड़ती है या फिर शिक्षा का अभाव भी एक कारण हो सकता है। दिनों-दिन बाल मजदूरों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। बाल मजदूरी को रोकने कड़े कानून भी बनाए गए है। इन मासूमों का भविष्य आने वाले दिनों क्या होगा यह चिंता का विषय बनकर रह गया है।

[highlight color=”green”]स्मार्ट क्लास से क्रान्ति के ख्वाब[/highlight] 

जहा एक ओर सूबे में नाबालिग बच्चे दर दर भटक रहे है पेट भरने को मजबूर है शिक्षा से कोसो दूर है वही दूसरी ओर सूबे के मुखिया स्मार्ट क्लास के जरिये क्रान्ति लाने के शब्ज बाग़ दिखा रहे है है,, लिहाजा प्रदेश की दो अलग अलग तश्वीरे एक ओर स्मार्ट क्लास से क्रान्ति और दूसरी ओर भूख से नहीं है बच्चो के पेट में शान्ति…….. किसी शायर ने सच ही कहा है की “भूख लगती है तो जज्बात भी मर जाते है….और पेट खाली हो तो चाहत नहीं अच्छी लगती”…शायर के इस बात में तो वाकई दम है लेकिन इस प्रदेश में भूख पर स्मार्ट क्लास का सपना देखा रहा है…… जो अपने मुह मिया मिट्ठू बनने के सिवा और कुछ नही लग रहा है…

[highlight color=”green”]बच्चो के संरक्षण की योजनाये कागजी स्याह[/highlight] 

देश में बाल संरक्षण के क्षेत्र में विभिन्न योजनाये चलाई जा रही है, बच्चो की इस हालत को सुधारने के नाम पर कई नाम चीन सामाजिक संस्थाए भी अपनी झोलिया भरी जा रही है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है,, इन योजनाओं का क्रियान्वयन अगर होता तो या द्रश्य गाव और शहर के हर चौक चौराहों पर नही दिखता,, इन बच्चो का दर्द समाज में नाबालिग बच्चो की यह तस्वीर हमें तो नजर आती है और शायद आपको भी नजर आती होगी

नीचे पढ़िए स्मार्ट क्लास से कैसे आयेगी प्रदेश में क्रान्ति

http://fatafatnews.com/smart-class-will-be-the-new-revolution-in-education-dr-singh/

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